यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के हक में संसद में गूंजी राघव चड्ढा की आवाज, कॉपीराइट एक्ट में बदलाव की जोरदार मांग
दिल्ली: दिनांक 18 दिसंबर 2025 को आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने राज्यसभा में देश के लाखों कंटेंट क्रिएटर्स, यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के हितों की रक्षा के लिए एक अहम मुद्दा उठाया है। उन्होंने सदन में स्पष्ट कहा कि आज के दौर में ये क्रिएटर्स भारत के जमीनी स्तर के संचारक बन चुके हैं और इनके डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि उनकी आजीविका और कड़ी मेहनत का परिणाम हैं।
सांसद ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स द्वारा मनमाने ढंग से दी जाने वाली कॉपीराइट स्ट्राइक ने क्रिएटर्स के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। अक्सर महज कुछ सेकंड के वीडियो या ऑडियो क्लिप का इस्तेमाल करने पर, चाहे वह शिक्षा, समाचार या व्यंग्य के उद्देश्य से ही क्यों न हो, क्रिएटर्स के चैनल और सालों की मेहनत को एक झटके में खत्म कर दिया जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आजीविका का फैसला कानून के द्वारा होना चाहिए न कि किसी मनमाने एल्गोरिदम के आधार पर।
राघव चड्ढा ने तर्क दिया कि भारत का कॉपीराइट अधिनियम 1957 उस दौर में बना था जब इंटरनेट और डिजिटल मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं था। यह कानून किताबों और पत्रिकाओं के लिए तो फेयर डीलिंग की बात करता है लेकिन आज के डिजिटल क्रिएटर्स को परिभाषित करने में विफल है। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि फेयर यूज़ पाइरेसी नहीं है और रचनात्मकता डर के माहौल में पनप नहीं सकती।
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए उन्होंने सरकार के समक्ष प्रमुख मांगे रखी हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण कॉपीराइट अधिनियम में संशोधन कर डिजिटल फेयर यूज़ को परिभाषित करना है। इसके अलावा उन्होंने मांग की कि कॉपीराइट उल्लंघन के मामलों में सजा या कार्रवाई का पैमाना गलती के अनुपात में होना चाहिए और किसी भी कंटेंट को हटाने से पहले एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य किया जाना चाहिए ताकि देश के युवाओं के रोजगार और रचनात्मकता को सुरक्षित रखा जा सके।