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Editor: Naresh Prasad Soni
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हजारीबाग में बैंककर्मियों की हुंकार, 'फाइव डेज बैंकिंग' की मांग पर हड़ताल से कामकाज ठप, सड़कों पर उतरा आक्रोश

हजारीबाग में बैंककर्मियों की हुंकार, 'फाइव डेज बैंकिंग' की मांग पर हड़ताल से कामकाज ठप, सड़कों पर उतरा आक्रोश

नरेश सोनी विशेष संवाददाता । हजारीबाग | 27 जनवरी 2026

हजारीबाग: यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के आह्वान पर आज हजारीबाग जिले की बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। 'फाइव डेज बैंकिंग' यानी सप्ताह में पांच कार्यदिवस की अपनी चिरप्रतीक्षित मांग को लेकर जिले भर के बैंक अधिकारी और कर्मचारी लामबंद होकर सड़कों पर उतर आए। एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल के चलते राष्ट्रीयकृत बैंकों के ताले नहीं खुले और वित्तीय कामकाज पूरी तरह ठप रहा। इस दौरान शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर विशाल रैली निकालकर लगभग 500 बैंककर्मियों ने अपनी एकता का प्रदर्शन किया और सरकार की टालमटोल नीति के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

हड़ताली बैंककर्मियों का स्पष्ट कहना है कि डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन लेन-देन के तकनीकी विस्तार ने कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन तो किया है, किंतु इसके विपरीत बैंककर्मियों पर मानसिक और शारीरिक कार्यभार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। प्रदर्शनकारियों ने रोष व्यक्त करते हुए तर्क दिया कि जब आरबीआई, एलआईसी, जीआईसी और स्टॉक एक्सचेंज जैसी केंद्रीय संस्थाओं में पांच दिवसीय कार्य सप्ताह की व्यवस्था पहले से ही लागू है, तो बैंककर्मियों के साथ यह भेदभावपूर्ण रवैया क्यों अपनाया जा रहा है? वे केवल 'कार्य-जीवन संतुलन' और अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यह मांग कर रहे हैं, जो उनका नैसर्गिक अधिकार है।

इस व्यापक विरोध प्रदर्शन की मूल वजह सरकार की वादाखिलाफी मानी जा रही है। मार्च 2024 में इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) और यूनियनों के बीच हुए 12वें द्विपक्षीय समझौते में सभी शनिवारों को अवकाश घोषित करने पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी थी। विडंबना यह है कि समझौते के लंबे समय बाद भी सरकार ने अब तक इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की है। वर्तमान व्यवस्था में केवल दूसरे और चौथे शनिवार को ही अवकाश मिलता है। संगठन ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे सप्ताह में पांच दिन कार्य करने के बदले प्रतिदिन 40 मिनट अतिरिक्त समय देने को भी तत्पर हैं, किंतु सरकार की उदासीनता अब धैर्य की परीक्षा ले रही है।

आक्रोशित कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि वित्त मंत्रालय और डीएफएस ने उनकी जायज मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण करेगा जिसकी समस्त जिम्मेदारी शासन की होगी। आज के इस सफल आंदोलन और रैली को नेतृत्व प्रदान करने में बैंक ऑफ इंडिया से अमर कुमार, मनीष बरनवाल, बिंदेश्वर प्रसाद, शिव कुमार यादव, राजेश कुमार, एसबीआई अधिकारी संघ के संगठन सचिव बीरेंद्र कुमार मुंडा, कर्मचारी यूनियन के जिला सचिव पवन कुमार सिन्हा, केनरा बैंक के शशि कुमार बागे और इंडियन बैंक के संतोष कुमार पाण्डेय सहित सैकड़ों अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी मुखर भागीदारी सुनिश्चित की।


शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज में 'नौकरी के बदले नोट' का खेल!



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आरक्षण दरकिनार, आउटसोर्सिंग एजेंसी पर पैसे लेकर बहाली करने का सनसनीखेज आरोप

हजारीबाग। हजारीबाग के प्रतिष्ठित शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एसबीएमसीएच) की साख पर एक बार फिर बट्टा लगा है। अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था के बाद अब आउटसोर्सिंग के जरिए हो रही नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और धांधली का मामला उजागर हुआ है। अस्पताल में आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत कंप्यूटर ऑपरेटरों की बहाली प्रक्रिया में सरकारी नियमों और आरक्षण रोस्टर की खुलेआम धज्जियां उड़ाने की बात सामने आई है, जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। इस गंभीर अनियमितता को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सदर विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी मुन्ना सिंह के मीडिया सलाहकार विक्की धान ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने उपायुक्त को लिखित शिकायत सौंपते हुए आउटसोर्सिंग एजेंसी 'राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज' पर पैसे लेकर अवैध रूप से नियुक्तियां करने का सीधा और गंभीर आरोप लगाया है।

​मामले की गहराई में जाने पर एक सुनियोजित धांधली की तस्वीर उभरती है। दस्तावेजों के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक ने पत्रांक 3480 (दिनांक 17/12/2025) के जरिए रांची स्थित एजेंसी मेसर्स राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्रा. लि. को आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के सुचारू संचालन हेतु 10 अतिरिक्त कंप्यूटर ऑपरेटरों की नियुक्ति का आदेश दिया था। इस आदेश में अधीक्षक ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में हिदायत दी थी कि बहाली प्रक्रिया में झारखंड सरकार की आरक्षण नियमावली और रोस्टर का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, लेबर लॉ का पालन करते हुए पारदर्शी तरीके से वैकेंसियाँ निकालने और कॉलेज की जांच कमेटी द्वारा दक्षता परीक्षण के बाद ही अंतिम चयन करने का निर्देश था।

​बावजूद इसके, उपायुक्त को सौंपी गई शिकायत में दावा किया गया है कि एजेंसी ने अपनी मनमानी करते हुए अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन के इन निर्देशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। विक्की धान ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि एजेंसी ने आरक्षण रोस्टर को पूरी तरह दरकिनार कर दिया, जिससे एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के योग्य अभ्यर्थी अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रह गए। शिकायत में यह भी कहा गया है कि यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया योग्यता या मेरिट के आधार पर नहीं, बल्कि 'पैसे लेकर' की गई है, जो कि सीधे तौर पर भ्रष्टाचार है।

​इस खुलासे ने सरकारी संस्थानों में आउटसोर्सिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता ने उपायुक्त से मांग की है कि संदिग्ध तरीके से हुई इन नियुक्तियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए और पूरे मामले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही, आरक्षण नियमों का पालन करते हुए नए सिरे से पारदर्शी बहाली प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई है ताकि गरीब और जरूरतमंद मेधावी छात्रों को न्याय मिल सके। अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वे इस 'भर्ती घोटाले' पर क्या कार्रवाई करते हैं।

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