झारखंड में 'ब्लैक बोर्ड' तक सीमित नहीं रहेगी पढ़ाई, अब 'मां की बोली' में गढ़ेंगे भविष्य- मंत्री सुदिव्य कुमार ने क्षेत्रीय भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर दिया जोर
रांची:
होटल चाणक्य बीएनआर में आयोजित बहुभाषी शिक्षा पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव एक ऐतिहासिक वैचारिक मंथन का गवाह बना जहाँ उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार ने झारखंड की भाषायी विविधता को राज्य की सबसे बड़ी ताकत बताया। मंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि झारखंड वह धरती है जहाँ 'कोस-कोस पर पानी बदले, दस कोस पर वाणी' की कहावत चरितार्थ होती है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की वकालत करते हुए कहा कि जब तक बच्चों की शुरुआती तालीम उनकी मातृभाषा में नहीं होगी तब तक शिक्षा केवल ब्लैक बोर्ड तक ही सिमट कर रह जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि मां ही बच्चे की पहली गुरु होती है इसलिए 'मदर टंग' ही सीखने का सबसे वैज्ञानिक और स्वाभाविक माध्यम है।
मंत्री ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आधुनिकता की दौड़ में प्रदेश की समृद्ध जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं। इन भाषाओं को बचाने का एकमात्र रास्ता यही है कि इसे क्लासरूम का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी लोकभाषाओं को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने की पुरजोर वकालत की। इस दौरान उन्होंने विभागीय अधिकारियों और मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वर्तमान में केवल कुछ जिलों में चल रही 'पलाश परियोजना' का विस्तार राज्य के सभी चौबीस जिलों में किया जाए ताकि हर बच्चे को अपनी बोली में सीखने का अधिकार मिल सके।
समारोह में देश भर से आए शिक्षाविदों की मौजूदगी में उन शिक्षकों और छात्राओं को भी सम्मानित किया गया जिन्होंने स्थानीय भाषाओं में पठन-पाठन सामग्री तैयार करने में महती भूमिका निभाई है। मंत्री ने विश्वास जताया कि इस दो दिवसीय मंथन से जो अमृत निकलेगा वह झारखंड की स्कूली शिक्षा को एक नई और व्यावहारिक दिशा देगा जिससे न केवल भाषाएं बचेंगी बल्कि एक जागरूक और संवेदनशील समाज का निर्माण भी होगा।

