बाल विवाह पर अब तक का सबसे बड़ा प्रहार- महज रस्म नहीं, सीधा जेल का रास्ता और सामाजिक कलंक मिटाने की अंतिम जंग
दिल्ली: सदियों पुरानी सामाजिक कुरीति के खिलाफ भारत ने अब निर्णायक युद्ध का शंखनाद कर दिया है और बाल विवाह अब महज एक सामाजिक परंपरा नहीं बल्कि सीधे तौर पर जेल की सलाखों के पीछे ले जाने वाला संगीन अपराध बन चुका है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वयस्कों द्वारा बच्चों से विवाह करने, उसे आयोजित कराने, सहयोग देने या उसमें मात्र उपस्थित होने पर भी दो साल का कठोर कारावास और एक लाख रुपये तक का जुर्माना भुगतना होगा। देश के नौनिहालों के बचपन को सुरक्षित करने के लिए शुरू किया गया 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान अब केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन का रूप ले चुका है जिसका सीधा मकसद 2030 तक इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकना है।
इस महाअभियान को सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले से नई धार मिली है जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि बाल विवाह स्वायत्तता को कमजोर करता है और इसे रोकने के लिए अब केवल कानून का डर नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर निगरानी का भी कड़ा पहरा होगा। देश के हर जिले में विशेष बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) तैनात किए गए हैं जो न केवल विवाह रोकेंगे बल्कि साक्ष्य जुटाकर दोषियों को अदालत के कटघरे में खड़ा करेंगे। मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा जारी करने की शक्ति दी गई है जिसका उल्लंघन करने पर विवाह तुरंत अमान्य घोषित होगा और दोषी सीधे कानून के शिकंजे में होंगे।
विज्ञान भवन से शुरू हुई इस मुहिम में आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए एक समर्पित पोर्टल के जरिए हर मामले की रियल टाइम रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जा रही है। 100 दिवसीय विशेष अभियान के तहत स्कूलों, आंगनवाड़ियों और धार्मिक नेताओं को इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया गया है। बदलाव की यह बयार असर दिखाने लगी है और छत्तीसगढ़ का बालोद जिला देश के लिए एक नजीर बनकर उभरा है जहां जनभागीदारी के चलते लगातार दो वर्षों से बाल विवाह का एक भी मामला सामने नहीं आया है। अब यह लड़ाई केवल एक कानून के पालन की नहीं बल्कि देश के भविष्य को सुरक्षित करने की है ताकि विकसित भारत का सपना देख रही युवा पीढ़ी का बचपन मंडप की आग में झुलसने के बजाय शिक्षा और स्वाभिमान के उजाले में खिल सके।
