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Editor: Naresh Prasad Soni
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हिंद महासागर में भारत की वैज्ञानिक कूटनीति का नया अध्याय, आठ देशों के ऐतिहासिक सफर पर निकला आईएनएस सागरध्वनि


हिंद महासागर में भारत की वैज्ञानिक कूटनीति का नया अध्याय, आठ देशों के ऐतिहासिक सफर पर निकला आईएनएस सागरध्वनि

देश : रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर हिंद महासागर में वैज्ञानिक सहयोग और कूटनीतिक रिश्तों को नई धार देने के लिए 'सागर मैत्री-5' मिशन का आगाज कर दिया है। कोच्चि स्थित दक्षिणी नौसेना कमान से भारत के प्रतिष्ठित समुद्र विज्ञान अनुसंधान पोत आईएनएस सागरध्वनि को रक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष राधा मोहन सिंह ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह मिशन केवल एक समुद्री यात्रा नहीं, बल्कि भारत सरकार के 'महासागर' (MAHASAGAR) विजन के तहत पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा और विकास के साझा लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम है।

​इस महत्वाकांक्षी अभियान के तहत आईएनएस सागरध्वनि 1962-65 के दौरान आईएनएस कृष्णा द्वारा तय किए गए ऐतिहासिक समुद्री रास्तों पर दोबारा सफर करेगा। यह पोत हिंद महासागर रिम के आठ प्रमुख देशों—ओमान, मालदीव, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और म्यांमार—के साथ वैज्ञानिक संबंधों को मजबूत करेगा। इस मिशन की शुरुआत मालदीव के साथ सहयोगी समुद्र विज्ञान अध्ययनों से हो रही है, जिससे इन देशों के वैज्ञानिकों के बीच संयुक्त अनुसंधान और तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान का नया रास्ता खुलेगा। डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में शुरू हुआ यह सफर भारत की 'मैत्री' पहल (मरीन एंड एलाइड इंटरडिसिप्लिनरी ट्रेनिंग एंड रिसर्च इनिशिएटिव) का एक अहम हिस्सा है।

​डीआरडीओ की नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (एनपीओएल) द्वारा डिजाइन किया गया और जीआरएसई द्वारा निर्मित यह जहाज समुद्री ध्वनिक अनुसंधान में भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। मिशन के दौरान यह पोत समुद्र के भीतर की गतिविधियों और महत्वपूर्ण ध्वनिक डेटा को इकट्ठा करेगा, जो भारतीय नौसेना के लिए 'अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस' (यूडीए) हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा। 1994 में कमीशन किया गया आईएनएस सागरध्वनि पिछले तीन दशकों से भारत की समुद्री वैज्ञानिक क्षमताओं की रीढ़ बना हुआ है और अब यह सागर मैत्री मिशन के जरिए पड़ोसी मुल्कों के साथ तकनीक, विश्वास और सहयोग का एक मजबूत पुल तैयार करने निकल पड़ा है।

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