दिशोम जाहेर में गूंजी संताली अस्मिता की गूंज, राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने पंडित रघुनाथ मुर्मू को दी श्रद्धांजलि
करनडीह में 22वां संताली "परसी महा" और ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष का भव्य आयोजन; पारंपरिक विधि-विधान से हुई पूजा-अर्चना।
जमशेदपुर : लौहनगरी के करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान में आज संताली भाषा और संस्कृति के गौरव का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला। अवसर था 22वें संताली “परसी महा” (भाषा दिवस) और संताली लिपि 'ओलचिकी' के शताब्दी वर्ष समारोह का। इस गरिमामयी कार्यक्रम में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु , झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संयुक्त रूप से शिरकत की।
पारंपरिक रीति-रिवाजों से पूजा-अर्चना
कार्यक्रम की शुरुआत करनडीह जाहेरथान में पारंपरिक विधि-विधान के साथ हुई। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित सभी गणमान्य अतिथियों ने जाहेरथान में पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख, समृद्धि और शांति की कामना की। इस दौरान जाहेरथान का माहौल पूरी तरह पारंपरिक वाद्य यंत्रों और भक्ति भाव से सराबोर रहा।
गुरु गोमके को दी श्रद्धांजलि
समारोह के दौरान अतिथियों ने संताली भाषा की ओलचिकी लिपि के आविष्कारक गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू जी का योगदान केवल एक लिपि तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने संताली समाज को एक नई बौद्धिक पहचान दी है।
सांस्कृतिक अस्मिता का संकल्प
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर अपनी खुशी साझा करते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक शताब्दी वर्ष समारोह का हिस्सा बनना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने संताली भाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। कार्यक्रम में भारी संख्या में संताल समाज के लोग जुटे, जिन्होंने अपनी भाषा और लिपि के 100 गौरवशाली वर्षों का जश्न मनाया।
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