वेद-पुराणों से इतर जनजातीय भाषाओं में भी स्पंदित है भारतीय ज्ञान परंपरा, जेन-जी की 'स्लैंग' शब्दावली पर चिंता के बीच विभावि में राष्ट्रीय समागम संपन्न
हजारीबाग। विनोबा भावे विश्वविद्यालय के स्वा
मी विवेकानंद सभागार में विगत तीन दिनों से चल रहे वैचारिक मंथन का समापन शनिवार को एक वृहद संकल्प और भाषाई चेतना के साथ हुआ। तीन-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में भारतीय ज्ञान परंपरा, लोक भाषाओं के संरक्षण और आधुनिक युवा पीढ़ी द्वारा प्रयोग की जा रही भाषा शैली पर गंभीर विमर्श किया गया। समापन सत्र में यह स्वर प्रमुखता से उभरा कि भारतीय प्रज्ञा केवल प्राचीन संस्कृत ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वनवासियों और जनजातियों की मौखिक परंपराओं में भी उतनी ही तीव्रता से धड़क रही है।
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि और राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) की पूर्व अध्यक्ष प्रो. सरोज शर्मा ने भाषा के दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्ष को उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा में शब्द, दर्शन और वैज्ञानिकता का प्रवाह एक साथ चलता है। उन्होंने भारतीय मनीषा में 'शब्द-ब्रह्म' की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि शब्दों में नाद होता है और नाद में ही ब्रह्म का वास है, यहाँ तक कि मौन की भी अपनी एक सशक्त भाषा होती है। वर्तमान दौर में 'जेन-जी' पीढ़ी द्वारा प्रयुक्त की जा रही 'स्लैंग' भाषा पर उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की और इसे भाषाई अवमूल्यन का संकेत माना। प्रो. शर्मा ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी अभिव्यक्ति को परिष्कृत करें, क्योंकि भाषा की शुचिता ही संस्कृति का आधार है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाषा को लेकर होने वाले विवादों के मूल में अक्सर राजनीति होती है, जबकि भारत में संस्कृतनिष्ठ भाषा, दक्षिण की द्रविड़ भाषाएं और जनजातीय बोलियां सह-अस्तित्व के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करती रही हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. चंद्र भूषण शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षितिज को विस्तारित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का ज्ञान केवल वेद और पुराणों के पृष्ठों में ही नहीं सिमटा है, अपितु यह देश की समृद्ध जनजातीय भाषाओं में भी अंतर्निहित है। कुलपति ने केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) के प्रति आभार जताते हुए आशा व्यक्त की कि भविष्य में विभावि और संस्थान मिलकर लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण की दिशा में सार्थक कदम उठाएंगे।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) के निदेशक प्रो. शैलेंद्र मोहन ने भाषाई तकनीक और संरक्षण के प्रयासों का विस्तृत ब्यौरा दिया। उन्होंने घोषणा की कि देश की सभी भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं और उनके संरक्षण के लिए संस्थान कटिबद्ध है। प्रो. मोहन ने जानकारी दी कि भारत की 88 जनजातीय भाषाओं पर 'प्रवेशिका' तैयार कर ली गई है और 70 लुप्तप्राय भाषाओं के लिए 'भाषा संचिका' का निर्माण किया गया है। उन्होंने 'भाषा सागर' ऐप और 'भारत वाणी' जैसे डिजिटल उद्यमों का उल्लेख करते हुए बताया कि तकनीक के माध्यम से अब किसी भी भारतीय भाषा को सीखा जा सकता है। वर्तमान में 75 भारतीय भाषाओं में शब्दकोश उपलब्ध हैं और बहुभाषी शब्दकोश निर्माण की प्रक्रिया युद्धस्तर पर जारी है।
इससे पूर्व, भारतीय भाषा समिति (भारत सरकार) के शैक्षणिक समन्वयक चंदन श्रीवास्तव ने लोक भाषा और मातृभाषा के संवर्धन पर चल रहे सरकारी प्रयासों की रूपरेखा प्रस्तुत की। संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. विनोद रंजन ने तीन दिनों के बौद्धिक विमर्श का सार प्रस्तुत करते हुए प्रतिवेदन पढ़ा। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में कुल 152 शोध आलेख समर्पित किए गए, जिनका मूल निष्कर्ष यही था कि 'विजन 2047' की संकल्पना तभी साकार होगी जब हम अपनी भाषाई जड़ों को सिंचित करेंगे।
समारोह के सांस्कृतिक पक्ष में शिक्षाशास्त्र विभाग की डॉ. विनीता बांकीरा एवं डॉ. भारती सिंह के निर्देशन में प्रस्तुत झूमर नृत्य ने अतिथियों का मन मोह लिया। कार्यक्रम के अंतिम दिन आर्यभट्ट सभागार में एक विशेष तकनीकी सत्र का आयोजन हुआ, जिसमें मुंडा जनजाति पर केंद्रित एक लघु शोध फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा निर्मित और डॉ. गंगानाथ झा के शोध पर आधारित इस फिल्म में पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा द्वारा संस्कृति की विशद व्याख्या और मुंडा जनजाति के ऐतिहासिक एवं सूक्ष्म पहलुओं को दर्शाया गया, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
समारोह का स्वागत संबोधन कुलसचिव डॉ. प्रणिता ने दिया, जबकि मंच पर समाज विज्ञान के पूर्व संकायाध्यक्ष डॉ. सादिक रज्जाक भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के कुलानुशासक और संगोष्ठी संयोजक प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए घोषणा की कि संगोष्ठी में आए सभी आलेखों को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर उन्हें अकादमिक जगत को समर्पित किया जाएगा। मंच संचालन का दायित्व यूसेट के डॉ. अरुण कुमार मिश्रा एवं हिंदी विभाग के डॉ. सुनील कुमार दुबे ने गरिमामय ढंग से निभाया। इस बौद्धिक महाकुंभ में विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों की भारी उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि अपनी भाषाओं के प्रति अनुराग अभी भी जनमानस में जीवित है।


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