विभावि में 'विजन 2047' और जनजातीय अस्मिता पर बौद्धिक महाकुंभ का शंखनाद आज, 10 राज्यों के मनीषियों संग चिंतन करेंगी यूनेस्को सलाहकार पद्मश्री अन्विता अब्बी
नरेश सोनी विशेष संवाददाता झारखंड | हजारीबाग
हजारीबाग की बौद्धिक और शैक्षणिक धरा विनोबा भावे विश्वविद्यालय में आज से ज्ञान, परंपरा और संस्कृति के संरक्षण हेतु एक ऐतिहासिक अध्याय का शुभारंभ होने जा रहा है। विश्वविद्यालय और केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाली तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत आगाज आज पूर्वाह्न 11 बजे स्वामी विवेकानंद सभागार में होगा। 'विजन 2047: जनजातीय भाषा संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा' विषय पर केंद्रित इस महामंथन में देश भर के भाषा वैज्ञानिकों और चिंतकों का जमावड़ा लगेगा, जो विलुप्त होती भाषाई धरोहरों को सहेजने और उन्हें भविष्य के भारत की नींव बनाने पर गहन विमर्श करेंगे।
इस त्रिदिवसीय सारस्वत अनुष्ठान की गरिमा बढ़ाने के लिए मुख्य वक्ता के रूप में देश की मूर्धन्य भाषा वैज्ञानिक और पद्मश्री से विभूषित प्रो. अन्विता अब्बी उपस्थित रहेंगी। यूनेस्को की वर्ल्ड एटलस ऑफ लैंग्वेज की सलाहकार प्रो. अब्बी का हजारीबाग आना अकादमिक जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने हिमालय से लेकर अंडमान निकोबार तक की सौ से अधिक भाषाओं पर न केवल शोध किया है, बल्कि देश के छठे भाषा परिवार 'ग्रेट अंडमानी' की खोज कर वैश्विक पटल पर भारत का मान बढ़ाया है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. चंद्र भूषण शर्मा करेंगे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रख्यात कथाकार और डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण संस्थान के पूर्व निदेशक रणेन्द्र अपने विचार साझा करेंगे।
आयोजन सचिव और मानव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनोद रंजन ने बताया कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का फलक अत्यंत व्यापक है, जिसमें दस राज्यों के विषय विशेषज्ञ, विद्वान और शोधार्थी अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेंगे। प्रथम दिवस तीन तकनीकी सत्रों और तीन विशेष व्याख्यानों का आयोजन होगा, जिसमें जनजातीय भाषाओं के डिजिटलाइजेशन, दस्तावेजीकरण और उन पर मंडराते अस्तित्व के संकट जैसे गंभीर विषयों पर मंथन किया जाएगा। विशेष व्याख्यान सत्र में नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी मेघालय के प्रो. ओम प्रकाश, नागालैंड विश्वविद्यालय के प्रो. रवि कुमार रंजन और टीआरआई के पूर्व निदेशक नरेंद्र कुमार अपने शोधपरक वक्तव्य प्रस्तुत करेंगे।
संगोष्ठी का मूल उद्देश्य केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित न होकर, विजन 2047 के परिप्रेक्ष्य में जनजातीय ज्ञान परंपरा को मुख्यधारा के विमर्श में लाना है। इसमें संवेदनशील और संकटग्रस्त भाषाओं के संरक्षण, सरकारी नीतियों की समीक्षा, लोक परंपराओं में निहित वैज्ञानिकता और डिजिटल युग में आदिवासी संस्कृति की चुनौतियों पर विस्तृत प्रकाश डाला जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस ज्ञान यज्ञ में सभी संकायाध्यक्षों, विभागाध्यक्षों, प्राचार्यों और शोधार्थियों को आमंत्रित करते हुए इसे सफल बनाने का आह्वान किया है, ताकि भावी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और भारतीय ज्ञान परंपरा अक्षुण्ण रह सके।

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