हजारीबाग के सियासी रण में दम्पति की हुंकार
- विकास के वैश्विक स्वप्न और बुनियादी दर्द पर प्रहार करती एक नई उम्मीद की दस्तक
हजारीबाग: जिले के प्रशासनिक गलियारों में आज एक अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हुआ जब मेयर पद की दावेदारी हेतु एक ही परिवार से दो सशक्त स्वर मुखर होकर उभरे और उन्होंने स्थापित राजनीतिक समीकरणों को खुली चुनौती दे दी। नामांकन की प्रक्रिया केवल एक रस्म अदायगी नहीं रही अपितु यह जनमानस के आक्रोश और भविष्य के सुनहरे स्वप्नों के मध्य एक सेतु निर्माण का संकल्प बन गई। शहादत अंसारी और उनकी धर्मपत्नी नाजमा खातून ने गले में गेंदे के पुष्पों की माला धारण कर जब मीडिया के माध्यम से जनता को संबोधित किया तो उनके शब्दों में आत्मविश्वास का वह ओज स्पष्ट दिखाई दे रहा था जो प्राय! क्रांतियों का सूत्रपात करता है।
शहादत अंसारी ने व्यवस्था के जीर्ण शीशमहल पर तीखे सवालों के बाण छोड़ते हुए हजारीबाग की वर्तमान दुर्दशा को रेखांकित किया। उनकी वाणी में अपने गृह नगर को वैश्विक मानचित्र पर दुबई और सिंगापुर की भांति देदीप्यमान करने की महत्वाकांक्षा स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। उन्होंने शिक्षा के बाजारीकरण और अभिभावकों की पीड़ा को अपना स्वर देते हुए यह प्रतिज्ञा दोहराई कि यदि जनता ने उन पर विश्वास जताया तो वे रोजगार और विकास की ऐसी गंगा प्रवाहित करेंगे जिसका स्वप्न हर युवा देखता है। उनका यह दावा कि वे पहले ही हजारों युवाओं को आत्मनिर्भर बना चुके हैं उनकी कार्यशैली की प्रमाणिकता को सिद्ध करने का प्रयास था। उनका स्पष्ट कहना था कि यह लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं अपितु हजारीबाग के हर नागरिक के स्वाभिमान और उसके मौलिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की है।
वहीं दूसरी ओर इस चुनावी समर में उनकी अर्धांगिनी नाजमा खातून ने जनसमस्याओं के उस मर्म को स्पर्श किया जो प्रायः बड़े राजनीतिक वादों के शोर में विलीन हो जाते हैं। उन्होंने ट्रैफिक की अव्यवस्था और शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दे को पटल पर रखा। उन्होंने लाखे क्षेत्र में मंदिर और मजार जैसे पवित्र आस्था के केंद्रों के मध्य बहती गंदे पानी की नाली की विडंबना को जिस प्रकार उजागर किया वह प्रशासनिक उदासीनता पर एक करारा तमाचा है। उनका यह कथन कि ईश्वर की आराधना से पूर्व भक्तों को गंदगी से होकर गुजरना पड़ता है सत्ताधीशों की निष्ठुरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न अंकित करता है। नाजमा खातून की सादगी और उनकी अपील में एक गृहिणी की वेदना और एक नेत्री की दृढ़ता का अद्भुत संगम देखने को मिला।
भाजपा और कांग्रेस जैसे विशाल राजनीतिक वटवृक्षों की छांव के मध्य इस दम्पति का यह निर्भीक शंखनाद लोकतंत्र की उस वास्तविक शक्ति का परिचायक है जहाँ सामान्य नागरिक भी असाधारण स्वप्न देखने का साहस जुटा सकता है। समर्थकों का "जिंदाबाद" के नारों से आकाश को गुंजायमान कर देना इस बात का प्रमाण है कि हजारीबाग की जनता अब विकल्प की तलाश में है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में जनता जनार्दन इस भावनात्मक और विकासवादी अपील पर अपनी स्वीकृति की मुहर किस प्रकार लगाती है किन्तु इतना निश्चित है कि आज की इस घटना ने चुनावी फिजा में एक नई तपिश अवश्य पैदा कर दी है।


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