विधायक प्रदीप प्रसाद ने झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का मंच बना दिया।
हजारीबाग : उन्होंने केवल हजारीबाग ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राज्य की व्यवस्थागत खामियों को अत्यंत प्रखरता और तथ्यात्मक मजबूती के साथ सदन के पटल पर रखा। उनकी सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनहित के मुद्दों पर वे किसी भी प्रकार के समझौते के पक्ष में नहीं हैं।
राज्य की प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रहार करते हुए विधायक ने सूचना आयोग की शिथिलता और नियुक्तियों में हो रही देरी को एक गंभीर लोकतांत्रिक संकट बताया। इसी कड़ी में, उन्होंने पुलिस आधुनिकीकरण की कछुआ चाल पर भी सरकार को घेरा, जहां थानों में बुनियादी सुरक्षा तकनीक और सीसीटीवी की कमी कानून-व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
विकास और पर्यावरण के बीच के असंतुलन को उजागर करते हुए उन्होंने एनटीपीसी कोल साइडिंग से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाया। यह केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि बिरहोर जनजाति के अस्तित्व और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा मानवीय संकट है, जिसे विधायक ने पूरी संवेदनशीलता के साथ सदन में रखा। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, विशेषकर अस्पतालों में स्टाफ की कमी और आउटसोर्सिंग के नाम पर हो रही अनियमितताओं को लेकर उन्होंने सरकार से दो-टूक जवाब मांगा।
हजारीबाग की बुनियादी ढांचागत समस्याओं पर उन्होंने निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की मांग की। विशेषकर एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा पाइपलाइन बिछाने के नाम पर सड़कों को जर्जर छोड़ने की लापरवाही पर उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार किया। मरहेता-पौंता और केसुरा मोड़ जैसी सड़कों की बदहाली जनता के दैनिक जीवन का अभिशाप बन चुकी है, जिसे दूर करना विधायक ने अपनी प्राथमिकता बताया।
कृषि प्रधान क्षेत्र के लिए सिंचाई की महत्ता को समझते हुए उन्होंने गोंदा डैम जैसे पुराने जलाशयों के पुनरुद्धार की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि गिरते जलस्तर और घटती सिंचाई क्षमता को संभाला जा सके। वहीं, पशुधन योजना में व्याप्त बिचौलिया संस्कृति पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने सीधे तौर पर सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए।
सत्र का सबसे ज्वलंत मुद्दा ३७ करोड़ की लागत से बने सिलवार स्थित पॉलिटेक्निक भवन का रहा। वर्ष २०१५ से धूल फांक रही यह विशाल इमारत सरकारी उदासीनता का प्रतीक बन चुकी है। विधायक ने इस बर्बादी को हजारीबाग की बेटियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताते हुए इसे तत्काल बालिका महाविद्यालय के रूप में संचालित करने की पुरजोर वकालत की।
विधानसभा परिसर में विरोध प्रदर्शन से लेकर सदन के भीतर तार्किक बहस तक, प्रदीप प्रसाद ने यह सिद्ध किया कि वे जनता की समस्याओं के प्रति न केवल सजग हैं, बल्कि उनके समाधान के लिए सरकार को विवश करने का साहस भी रखते हैं।
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