-->
होम राशिफल
YouTube
ई-पेपर राज्य चुनें
✥ Drag to Move
▶ WATCH
Editor: Naresh Prasad Soni
Follow Us: Facebook YouTube Instagram Twitter

बड़कागांव में कोयला परियोजनाओं के खिलाफ ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: पदयात्रा और धरना दे सौंपा ज्ञापन, आवंटन रद्द करने की मांग

गोन्दलपुरा, बादम और रोहने सहित 5 कोल ब्लॉकों के खिलाफ ग्रामीणों का बड़ा आंदोलन। पीएमओ को भेजा ज्ञापन, कंपनियों पर फर्जी ग्राम सभा का आरोप लगा आवंटन रद
0

बड़कागांव में कोयला परियोजनाओं के खिलाफ ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: पदयात्रा और धरना दे सौंपा ज्ञापन, आवंटन रद्द करने की मांग

बड़कागांव (हजारीबाग)। झारखंड के हजारीबाग जिला अंतर्गत बड़कागांव प्रखंड के पूर्वी क्षेत्र में प्रस्तावित विभिन्न कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के विरोध में स्थानीय ग्रामीणों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीणों ने आज एकजुट होकर एक विशाल पदयात्रा एवं धरना कार्यक्रम का आयोजन किया। आंदोलन के अंत में ग्रामीणों ने उपायुक्त (डीसी) हजारीबाग के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री कार्यालय सहित केंद्रीय मंत्रियों को एक मांग पत्र (ज्ञापन) प्रेषित कर कोल ब्लॉकों के आवंटन को तत्काल रद्द करने की गुहार लगाई है।

Naya DC Office Hazaribagh Ke samaksh.

इन कोल ब्लॉकों के विरोध में उतरे ग्रामीण

ग्रामीणों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन के अनुसार, यह विरोध मुख्य रूप से गोन्दलपुरा, बादम, मोइत्रा, बाबूपारा एवं रोहने कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के खिलाफ है। ज्ञापन की प्रतिलिपियां निम्नलिखित प्रमुख कार्यालयों को भेजी गई हैं:

प्रधान सचिव, प्रधानमंत्री कार्यालय, नई दिल्ली।

संयुक्त सचिव, केंद्रीय कोयला मंत्रालय, भारत सरकार।

संयुक्त सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार।

संयुक्त सचिव, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार।

मुख्य सचिव, झारखंड सरकार, रांची।

विनाशकारी विकास और विस्थापन का डर

ग्रामीणों ने अपने आवेदन में तीखी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इन कोयला परियोजनाओं के कारण बड़कागांव प्रखंड के पूर्वी क्षेत्र का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा। इससे पूर्व भी पश्चिमी क्षेत्र में संचालित पकरीबरवाडीह कोयला परियोजना के कारण कई गांव पूरी तरह उजड़ चुके हैं, और वहां के अधिकांश निवासी विस्थापन का दंश झेलकर गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं।

Bhuneshwar Mehta, Pradeep Prasad, Roshan Lal Choudhary.

ग्रामीणों ने चेताया कि:

जल संकट: कर्णपुरा उत्तरी एवं दक्षिणी क्षेत्र में चल रही अन्य खनन परियोजनाओं के दुष्परिणाम सामने हैं। बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र के गांवों की सिंचाई एवं पेयजल का मुख्य स्रोत 'बदमाही नदी' है, जो इन नई परियोजनाओं के कारण पूरी तरह सूख जाएगी।

खाद्यान्न संकट: यह पूरा क्षेत्र नदियों और नालों के किनारे बसा है, जहां की भूमि बहुफसली एवं अत्यंत उपजाऊ है। यहां बड़े पैमाने पर धान, गन्ना, सब्जी, तिलहन और दलहन की खेती होती है। कृषि भूमि नष्ट होने से न केवल इस क्षेत्र में, बल्कि आसपास के इलाकों में भी गंभीर खाद्यान्न संकट पैदा हो जाएगा, जिसकी भरपाई किसी भी मुआवजे की राशि से संभव नहीं है।

पर्यावरण एवं वन्यजीवों को खतरा: इन परियोजनाओं के कारण हजारों हेक्टेयर वन भूमि नष्ट होगी और लाखों पेड़ काटे जाएंगे। बड़े वन क्षेत्र को नष्ट कर छोटे-छोटे बगीचे लगाना पर्यावरण संरक्षण का विकल्प नहीं हो सकता, जैसा कि गोन्दलपुरा कोल परियोजना में अडानी कंपनी द्वारा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र हाथियों का कॉरिडोर भी है, जिससे वन्यजीवों पर गंभीर संकट खड़ा होगा।

कंपनियों पर 'फर्जी' ग्राम सभाएं कराने का आरोप

ज्ञापन में स्थानीय प्रशासन और कंपनियों की कार्यशैली पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियां फर्जी किसानों को खड़ा कर ग्राम सभा एवं लोक सुनवाई जैसे नाटक आयोजित करने का प्रयास कर रही हैं। उदाहरणस्वरूप, अडानी कंपनी द्वारा 20 जनवरी 2026 तथा एनटीपीसी कंपनी द्वारा 10 मई 2026 को एनटीपीसी आईटीआई कॉलेज में आयोजित किए गए कार्यक्रमों को ग्रामीणों ने सिरे से 'अस्वीकार' कर दिया है।

ग्रामीणों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्र में निष्पक्ष रूप से मतपत्र (बैलेट पेपर) के माध्यम से जनमत संग्रह कराया जाए। यदि 51% जनता परियोजनाओं के पक्ष में निर्णय देती है तो परियोजनाएं जारी रहें, अन्यथा आवंटन तत्काल रद्द किया जाए।

आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें:

इन परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करने से संबंधित सभी फर्जी पत्रों एवं प्रक्रियाओं को तत्काल निरस्त किया जाए।

खाद्य, जल, प्राणवायु सुरक्षा एवं आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर उपरोक्त सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन तुरंत रद्द हो।

कंपनियों के विरोध को दबाने हेतु आंदोलनकारी किसानों व ग्रामीणों पर लगाए गए सभी झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं तथा गिरफ्तार साथियों को अविलंब रिहा किया जाए।

बड़कागांव पुलिस प्रशासन द्वारा कंपनियों के प्रभाव में आकर आंदोलनकारियों के साथ की जा रही मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और जमीन देने के दबाव पर तत्काल रोक लगाई जाए।

आंदोलन में प्रमुख रूप से शामिल चेहरे

धरना और पदयात्रा के संचालन एवं नेतृत्व में क्षेत्र के कई प्रमुख सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता शामिल रहे। कार्यक्रम में मुख्य रूप से संयुक्त किसान मोर्चा के महासचिव राजकुमार भारत (हरियाणा), आज आजादी क्यों आंदोलन (बिहार प्रदेश संयोजन) की शिलम झा, और सीपीआई (C.P.I) के प्रदेश सचिव महेंद्र पाठक उपस्थित थे।

इसके साथ ही स्थानीय आंदोलनकारियों और प्रतिनिधियों में बालेश्वर महतो, श्रीकांत निराला, यशोदा देवी, विकास कुमार, लोकनाथ महतो, मुखिया इलियास अंसारी, मुनेश्वर महतो, रवि कुमार दांगी (बादम), अनिरुद्ध कुमार दांगी (हरली), विनोद महतो (गोन्दलपुरा), प्रदीप प्रसाद (हजारीबाग सदर) और रोशन लाल चौधरी (बड़कागांव) आदि ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई।

भवदीय: समस्त प्रभावित ग्रामीण, बड़कागांव पूर्वी क्षेत्र, हजारीबाग, झारखंड।


संपादकीय टिप्पणी: विकास की कीमत पर विनाश कब तक?

बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र से उठी विरोध की यह आवाज कोई नई नहीं है, लेकिन यह इस बात का जिंदा सुबूत है कि 'विकास' के नाम पर 'विस्थापन' का जो दर्द झारखंड के आदिवासियों और किसानों को मिला है, उसकी टीस अब बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है। ग्रामीणों का यह डर पूरी तरह जायज है कि अगर उपजाऊ बहुफसली जमीन, बदमाही नदी जैसी जीवनदायिनी जलस्रोत और पर्यावरण का आधार माने जाने वाले जंगल ही उजाड़ दिए जाएंगे, तो मुआवजे के चंद टुकड़े भविष्य की भूख कैसे मिटा पाएंगे?

पकरीबरवाडीह परियोजना का उदाहरण सबके सामने है, जहां के मूल निवासी आज अपनी पहचान खोकर गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। ऐसे में गोन्दलपुरा, बादम और रोहने जैसी पांच बड़ी परियोजनाओं को बिना स्थानीय जनभावनाओं के लागू करना जल, जंगल और जमीन पर सीधे हमले जैसा है।

कॉर्पोरेट कंपनियों पर 'फर्जी' ग्राम सभाएं और लोक सुनवाई आयोजित करने के जो आरोप ग्रामीणों ने लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और लोकतंत्र की मूल भावना को आहत करते हैं। अगर देश का किसान और ग्रामीण मतपत्र (बैलेट पेपर) के जरिए जनमत संग्रह की मांग कर रहा है, तो सरकार और जिला प्रशासन को इस पारदर्शी प्रक्रिया से पीछे नहीं हटना चाहिए। लोकतंत्र में लाठी और मुकदमों के दम पर जनता की आवाज को दबाकर किया जाने वाला विकास, कभी भी जन-कल्याणकारी नहीं हो सकता। समय आ गया है कि नीतियां बनाने वाले एयर-कंडीशन कमरों से निकलकर बदमाही नदी के सूखने के खतरे और किसानों के माथे की चिंता को समझें।

— संपादक, न्यूज़ प्रहरी

No comments

Post a Comment

© 2025 News Prahari. All Rights Reserved. | Reg No: JH-11-0021972