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Editor: Naresh Prasad Soni
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'जनता को जनता की भाषा में मिले न्याय': मातृभाषा में न्यायिक कार्यवाही के लिए भारतीय भाषा अभियान का देशव्यापी शंखनाद

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के 'भारतीय भाषा अभियान' ने देश भर के न्यायालयों में न्यायिक कार्यवाही और फैसले मातृभाषा व हिंदी में करने की जोरदार मांग
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'जनता को जनता की भाषा में मिले न्याय': मातृभाषा में न्यायिक कार्यवाही के लिए भारतीय भाषा अभियान का देशव्यापी शंखनाद

हजारीबाग: देश की न्याय प्रणाली में आम जनमानस की भागीदारी और समझ को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक वृहद और प्रभावशाली पहल आकार ले रही है। वर्ष दो हजार चार में स्थापित 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' द्वारा संचालित 'शिक्षा बचाओ, देश बचाओ' प्रकल्प के अंतर्गत 'भारतीय भाषा अभियान' ने न्यायपालिका में भाषाई पारदर्शिता की एक अत्यंत प्रासंगिक मांग उठाई है। इस अभियान का मूल स्वर यही है कि देश के प्रत्येक नागरिक को न्याय उसी की भाषा में सुलभ होना चाहिए। वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में अधिकांश कार्यवाहियां ऐसी भाषा में होती हैं जो आम वादी या प्रतिवादी की समझ से परे होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप न्याय की वास्तविक अनुभूति जनसामान्य तक नहीं पहुंच पाती।

"मातृभाषा में न्यायिक कार्यवाही के लिए भारतीय भाषा अभियान का देशव्यापी शंखनाद"


​न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलता और भाषाई अवरोध को दूर करने के लिए इस अभियान के तहत यह मांग पुरजोर तरीके से रखी जा रही है कि अदालतों में होने वाली बहस, संवाद और अंतिम निर्णय मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में ही होने चाहिए। जब तक न्याय मांगने वाले पक्षकार को उसके मामले में हो रही जिरह और सुनाए गए फैसले का अर्थ अपनी मातृभाषा में समझ नहीं आएगा, तब तक न्याय प्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता और जन-संतुष्टि की कल्पना बेमानी है। अभियान का स्पष्ट मानना है कि न्यायालयों के फैसले और वकीलों की बहस ऐसी सहज भाषा में हो जिसे मुवक्किल स्वयं सुन, पढ़ और समझ सके। यदि कोई नागरिक इस मौलिक अधिकार से वंचित रहता है, तो उसे न्याय के लिए पुनः गुहार लगाने का अवसर मिलना चाहिए।

​इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों का भारतीय संविधान की बाईस भाषाओं में अनुवाद करवाने की पहल का स्वागत करते हुए, अभियान अब इसे निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक अनिवार्य रूप से लागू करवाने के लिए प्रयासरत है। विशेषकर झारखंड प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में उच्च न्यायालयों और जिला एवं अनुमंडल न्यायालयों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे अपनी कार्यवाहियों में स्थानीय और मातृभाषा के उपयोग को प्राथमिकता दें। इस पुनीत उद्देश्य की प्राप्ति और जन जागरूकता के लिए वर्तमान में पूरे देश में इक्कीस से अट्ठाईस तारीख तक 'अंतरराष्ट्रीय हिंदी पखवाड़ा' मनाया जा रहा है।

​इस पखवाड़े के समापन पर, यानी अट्ठाईस तारीख को, अभियान से जुड़े प्रतिनिधि देश के शीर्ष न्यायिक और संवैधानिक पदों पर आसीन विभूतियों को अपना मांग पत्र सौंपेंगे। यह ज्ञापन माननीय सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों, भारत सरकार के विधि मंत्री, राज्य के विधि मंत्री, मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल को प्रेषित किया जाएगा। भारतीय भाषा अभियान के प्रदेश सह-संयोजक महंत विद्यानंद दास ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया है कि जब तक न्यायपालिका के गलियारों में आम आदमी की भाषा को सम्मानजनक स्थान नहीं मिल जाता, तब तक यह भाषाई अस्मिता और न्याय का संघर्ष अनवरत जारी रहेगा।

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