हजारीबाग का 'जलतीर्थ', आस्था और बदहाली के संगम पर खड़ा चुनावी भविष्य
हजारीबाग: जिले के हृदय स्थल लाखे की यह तस्वीर किसी आधुनिक विकास की गाथा नहीं, बल्कि व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा है। यहाँ की फिजाओं में इन दिनों एक अजीब सी कशिश है, जहाँ खूबसूरती के मायने बदल गए हैं। शहर के गंदे नालों का उफनता पानी जब सड़कों पर सैलाब बनकर पसरता है, तो वह केवल कीचड़ नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता का आईना बन जाता है। विडंबना देखिए कि एक ओर सजदे में झुकी मजार की रूहानियत है, तो दूसरी ओर भक्ति रस में डूबा मंदिर, और इन दोनों के बीच घुटनों तक भरा यह 'नाली-रूपी अमृत' राहगीरों का स्वागत कर रहा है।
लोकतंत्र के इस अजीबोगरीब मंजर में श्रद्धालु मजबूर हैं कि वे अपनी आस्था की चौखट पर माथा टेकने से पहले इसी दूषित जल में अपने पांव पखारें। यह स्थान अब केवल एक मार्ग नहीं, बल्कि घोर अव्यवस्था का एक ऐसा 'दार्शनिक केंद्र' बन चुका है जो चीख-चीख कर जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और सांसद-विधायक के दावों की पोल खोल रहा है। शिक्षा की राह और भविष्य के सपनों को जोड़ने वाला यह मुख्य केंद्र बिंदु आज जलजमाव की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, जिससे गुजरना किसी उत्सव से कम जोखिम भरा नहीं है।
वर्तमान में जब नगर निगम चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और महापौर से लेकर वार्ड पार्षद तक के प्रत्याशी जनता के मान-सम्मान की रक्षा की कसमें खा रहे हैं, तब लाखे की यह सड़ांध मारती हकीकत उनके वादों की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। चुनावी चौसर पर बिछी इस बिसात में अब जनता को तय करना है कि वे इस 'नरकीय खूबसूरती' को और चार चांद लगाने वालों को चुनेंगे या फिर अपनी आस्था और बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने वाले किसी सच्चे सारथी को। देखना दिलचस्प होगा कि वोटों की इस होड़ में क्या जनता की चीख सत्ता के गलियारों तक पहुँच पाएगी या फिर विकास का यह 'गंदा पानी' यूं ही आस्था के आंचल को भिगोता रहेगा।


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