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Editor: Naresh Prasad Soni
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: कागजों पर सशक्तिकरण, पर हकीकत में आधी आबादी को अब भी समान हक का

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष: क्या महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य पूरा हुआ? राजनीति, सेना से लेकर घरेलू महिलाओं की स्थिति और विकसित देशों की हकीकत।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: कागजों पर सशक्तिकरण, पर हकीकत में आधी आबादी को अब भी समान हक का इंतजार

नई दिल्ली/संपादकीय: हर साल हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। मंचों से महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन अगर हम धरातल पर उतरकर देखें, तो जिस उद्देश्य से इस दिन की शुरुआत हुई थी, वह आज भी अधूरा है।

कागजों पर मिले अधिकारों और समाज की हकीकत के बीच आज भी अपने समान हक की लड़ाई लड़ती आधी आबादी। अम्बा प्रसाद 

सच्चाई यह है कि जब तक समाज की जड़ों में लिंगभेद (Gender Discrimination) मौजूद रहेगा, तब तक सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण संभव नहीं है।

दुनिया के कई देशों सहित हमारे देश के संविधान में भी लिंग के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को वर्जित किया गया है। कागजों पर समानता के अधिकार सुनिश्चित हैं, परंतु सामाजिक और मानसिक स्तर पर यह भेदभाव आज भी गहराई तक बरकरार है।

सत्ता और नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी का सच

आजादी के 77 साल से अधिक बीत जाने और संविधान लागू होने के इतने दशकों बाद भी देश के सर्वोच्च पदों पर महिलाओं की भागीदारी उंगलियों पर गिनी जा सकती है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में प्रधानमंत्री के पद पर अब तक केवल एक ही महिला (श्रीमती इंदिरा गांधी) आसीन हुई हैं। इसके अलावा, देश की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली सेनाओं—आर्मी, नेवी और एयरफोर्स—के चीफ कमांड के पद पर आज तक किसी महिला को कमान नहीं सौंपी गई है।

आर्थिक मोर्चे पर देखें तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर के रूप में भी महिलाओं की उपस्थिति न के बराबर रही है। राज्यों के राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों तक के आंकड़े चौंकाने वाले हैं; आज भी औसतन 90% से अधिक मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री पुरुष ही हैं।

घर की दहलीज के भीतर सम्मान की लड़ाई

सच्चे अर्थों में महिला दिवस मनाने की सार्थकता तब सिद्ध होगी, जब हमारे घरों में रहने वाली 70% से अधिक 'होममेकर' (Housewives) को उनके पतियों और परिवार द्वारा बराबर की अहमियत और सम्मान दिया जाएगा। जब तक घरेलू महिलाओं के श्रम और उनके वजूद को समान दर्जा नहीं मिलता, तब तक सशक्तिकरण की बातें बेमानी हैं।

विकसित देशों का भी यही है हाल

यह केवल विकासशील देशों की समस्या नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े पूंजीवादी और आर्थिक रूप से अत्यधिक विकसित देश अमेरिका की महिलाएं भी आज अपना वजूद और सुरक्षा तलाश रही हैं। वहां भी तलाक (Divorce) और घरेलू/शारीरिक उत्पीड़न के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं, जो यह साबित करते हैं कि आर्थिक विकास ही महिला सुरक्षा और समानता की गारंटी नहीं है। अगर हम अपने पड़ोसी देशों की ओर भी नजर दौड़ाएं, तो हालात कमोबेश ऐसे ही या इससे भी बदतर नजर आते हैं।

निष्कर्षतः, महिला सशक्तिकरण केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि समाज की सोच में एक निरंतर और गहरे बदलाव की मांग करता है। मंजिल अभी दूर है, लेकिन सफर जारी रहना चाहिए।

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