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Editor EDITOR: NARESH PRASAD SONI
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हजारीबाग में मानवता शर्मसार: एक हफ्ते में मिले 7 लावारिस शव, अस्पताल परिसर से शव मिलना चिंताजनक

हजारीबाग में एक सप्ताह के भीतर 7 अज्ञात शव मिलने से सामाजिक ताने-बाने और अस्पताल प्रबंधन पर उठे सवाल। रंजन चौधरी का समाज को झकझोरने वाला विशेष आलेख।
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विचारणीय: क्या हजारीबाग में दम तोड़ रही है इंसानियत? एक हफ्ते में मिले 7 लावारिस शव खड़े कर रहे हैं कई यक्ष प्रश्न

​हजारीबाग: आधुनिकता की अंधी दौड़ और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच क्या आज हमारा समाज मानवीय वेदना, संवेदना और इंसानियत के भाव से शून्य होता जा रहा है? यह एक ऐसा ज्वलंत प्रश्न है, जो इन दिनों अमन-चैन और आपसी सौहार्द के लिए मशहूर हजारीबाग के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर रहा है। हजारीबाग शहर और इसके आसपास के विभिन्न थाना क्षेत्रों से बीते महज एक सप्ताह के भीतर 7 लावारिस शवों का बरामद होना भविष्य के प्रति एक गंभीर चिंता का सबब बन गया है।

Hazaribagh: 1 हफ्ते में मिले 7 लावारis शव! मेडिकल कॉलेज परिसर से भी शव बरामद, उठ रहे कई बड़े सवाल।

​सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि इनमें से 5 शवों की अब तक शिनाख्त नहीं हो सकी है। पहचान के अभाव में इन अज्ञात शवों को शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस (मोर्चुरी) में रखा गया है। पुलिसिया तफ्तीश अपनी जगह जारी है, लेकिन यह स्थिति समाज के सामने एक मौन आईना रख रही है कि क्या ये शव बिना पहचान के ही काल के गाल में हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे?

    • ​Hazaribagh: 1 हफ्ते में मिले 7 लावारis शव! मेडिकल कॉलेज परिसर से भी शव बरामद, उठ रहे कई बड़े सवाल।

​नीरज कुमार और 'मुक्तिधाम सेवा संस्थान' ने पेश की मानवीय संवेदना की मिसाल

​इस कठिन और दुर्गंध भरे माहौल में जहाँ आम लोग मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं पुलिस की मौजूदगी में मुक्तिधाम सेवा संस्थान के सचिव सह वार्ड पार्षद प्रतिनिधि नीरज कुमार और उनकी टीम ने सेवा की एक अनूठी मिसाल पेश की है। उन्होंने भारी मशक्कत के बाद सभी शवों को सम्मानपूर्वक उठाकर मोर्चुरी तक पहुंचवाया।

​हीराबाग चौक के समीप एक गहरे दलदली नाले से शव को बाहर निकालने के दौरान नीरज कुमार स्वयं एक बड़े हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बचे। उन्होंने पहले डंडे के सहारे दलदल की गहराई मापी और फिर अमानवीय दुर्गंध को सहते हुए शव को बाहर निकाला। यदि इन शवों के अपनों का पता नहीं चल पाता है, तो इस टीम द्वारा ही इनका पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा। परंतु, सवाल यह उठता है कि क्या केवल अंतिम संस्कार कर देने मात्र से हमारा सामाजिक दायित्व समाप्त हो जाता है?

​मेडिकल कॉलेज कैंपस से दो अज्ञात शवों का मिलना सबसे रहस्यमयी

​पिछले एक सप्ताह में शवों के मिलने का सिलसिला न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि कई तरह के रहस्य भी पैदा करता है। शवों की बरामदगी के मुख्य स्थल निम्नलिखित हैं:

  • ​झील के मत्स्य विभाग के समीप से एक शव।
  • ​हीराबाग स्थित बिजली विभाग के सामने के नाले से।
  • ​नगवां-चुरचू के एक पत्थर माइंस (खदान) से।
  • ​रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन की बोगी के भीतर से।

​इन सबमें सबसे गंभीर और चिंतनीय विषय शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के परिसर से दो शवों का मिलना है। एक शव अस्पताल के वार्ड से और दूसरा ट्रामा सेंटर के ठीक बाहर से बरामद हुआ है। अस्पताल, जहाँ लोग जीवन बचाने की आस लेकर आते हैं, उसके भीतर और बाहर इस तरह लावारिस हालत में शवों का मिलना चिकित्सा व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता, दोनों पर बड़े प्रश्नचिह्न खड़े करता है।

​टूटते रिश्ते, अवसाद और सामाजिक अकेलापन

​वर्तमान दौर में मानसिक तनाव, डिप्रेशन (अवसाद), आर्थिक तंगी, नशे की बढ़ती लत और आपसी विवाद चरम पर हैं। अक्सर देखा जाता है कि लोग किसी दुर्घटनाग्रस्त या लाचार व्यक्ति को देखकर रास्ता बदल लेते हैं या फिर किसी मरीज को अस्पताल के बाहर लावारिस छोड़कर चंपत हो जाते हैं।

​ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर अब केवल शासन और प्रशासन को दोष देकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। परिवारों में आपसी संवाद घट रहा है, रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं और अकेलापन पैर पसार रहा है। आज समाज को मिलकर इस पर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने और नशा मुक्ति को एक सामाजिक आंदोलन बनाने का समय आ गया है।

​प्रशासन और सामाजिक संगठनों को उठाने होंगे ठोस कदम

​इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है:

  1. ​सीसीटीवी निगरानी: प्रशासन को शहर के सुनसान इलाकों के साथ-साथ अस्पताल जैसे अति-संवेदनशील परिसरों में व्यापक सीसीटीवी कैमरों की निगरानी सुनिश्चित करनी होगी।
  2. ​पुनर्वास की सुदृढ़ व्यवस्था: बेसहारा, बुजुर्ग और अज्ञात लोगों की पहचान व उनके समय पर पुनर्वास (Rehabilitation) के लिए तंत्र को मजबूत करना होगा।
  3. ​सामूहिक जिम्मेदारी: राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवकों और आम नागरिकों को महज इसे एक 'खबर' समझकर नजरअंदाज करने के बजाय अपनी मानवीय जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से करना होगा।

​ये लावारिस शव केवल मृत शरीर नहीं हैं, बल्कि ये समाज की टूटती संवेदनाओं और व्यवस्था की कमियों की मौन दास्तान हैं। यदि आज हम अपने भीतर के इंसान को नहीं जगाएंगे, तो आने वाले समय में मनुष्य और पशुओं की संवेदना में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

​(यह आलेख हजारीबाग संसदीय क्षेत्र के सांसद मीडिया प्रतिनिधि रंजन चौधरी के व्यक्तिगत विचारों और सामाजिक विमर्श पर आधारित है।)

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