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EDITOR: NARESH PRASAD SONI
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अत्याचार के विरुद्ध अभेद्य सुरक्षा कवच: एससी-एसटी समुदाय की अस्मिता और अधिकारों का सजग प्रहरी है 'एट्रोसिटी एक्ट', 14566 पर कॉल करते ही हरकत में आएगा प्रशासन

अत्याचार के विरुद्ध अभेद्य सुरक्षा कवच: एससी-एसटी समुदाय की अस्मिता और अधिकारों का सजग प्रहरी है 'एट्रोसिटी एक्ट', 14566 पर कॉल करते ही हरकत में आएगा प्रशासन

New Delhi: समाज के वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाने और उनके स्वाभिमान की रक्षा करने की दिशा में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक सशक्त संवैधानिक हथियार बनकर उभरा है। सदियों से चली आ रही दमनकारी मानसिकता और भेदभाव की बेड़ियों को तोड़ने के लिए बना यह कानून केवल एक नियमावली नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का वह महामंत्र है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है। राष्ट्र में समरसता और समानता के भाव को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से सरकार ने अब न्याय की राह को और भी सुगम बना दिया है, ताकि पीड़ित को अपनी आवाज उठाने के लिए भटकना न पड़े।

अक्सर जानकारी के अभाव या भय के कारण शोषित वर्ग अपने ऊपर हो रहे जुल्म को चुपचाप सहने पर विवश हो जाता था, लेकिन अब परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आया है। केंद्र सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 14566 अब पीड़ितों के लिए संजीवनी का कार्य कर रही है। यदि किसी भी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के साथ जातिगत भेदभाव, दुर्व्यवहार, हिंसा या उनके अधिकारों का हनन होता है, तो वे सीधे इस टोल-फ्री नंबर पर संपर्क कर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस हेल्पलाइन का उद्देश्य न केवल तत्काल सहायता पहुँचाना है, बल्कि पीड़ित की पहचान को गोपनीय रखते हुए उन्हें त्वरित न्याय दिलाना भी है। एक कॉल पर ही प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो जाएगा और दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

कानून के जानकारों का मानना है कि यह अधिनियम शोषकों के मन में भय और पीड़ितों के मन में विश्वास पैदा करने वाला एक ऐतिहासिक कदम है। प्रशासन ने भी आम जनमानस से अपील की है कि वे अत्याचार को मूकदर्शक बनकर देखने के बजाय इस कानून का सहारा लें। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की यह पहल इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में हर नागरिक की गरिमा सर्वोपरि है। अब वक्त आ गया है कि समाज का हर वर्ग अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो और अन्याय के खिलाफ मौन तोड़े, क्योंकि कानून का यह 'वज्र' उनकी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर है।

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