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Editor: Naresh Prasad Soni
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जनजातीय भाषाओं के संरक्षण में निहित है मानवता का भविष्य, डिजिटल युग की परिपक्वता के लिए आदिम ज्ञान का समागम अनिवार्य

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जनजातीय भाषाओं के संरक्षण में निहित है मानवता का भविष्य, डिजिटल युग की परिपक्वता के लिए आदिम ज्ञान का समागम अनिवार्य

हजारीबाग: विनोबा भावे विश्वविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में आयोजित विजन 2047,  जनजातीय भाषा संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा विषयक त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र ने भाषाई विमर्श के नए द्वार खोल दिए हैं। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पद्मश्री प्रो अन्विता अब्बी ने अपने उद्बोधन में अत्यंत गूढ़ तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और चैट-जीपीटी जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए विकसित की जा रही डिजिटल भाषाओं में यदि जनजातीय भाषाओं के ज्ञान कोश को सम्मिलित किया जाए, तो ये भाषाएं अधिक परिपक्व और सुसंगत बनेंगी। उन्होंने मुंडारी जैसी ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं को संस्कृत से भी प्राचीन बताते हुए डिजिटल प्रविधि में उनकी श्रेष्ठता को रेखांकित किया। प्रो अब्बी ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि भाषा का विलुप्त होना केवल शब्दों का अंत नहीं बल्कि समझने की मानवीय शक्ति का अंत है, क्योंकि भाषा हमारी सोच, दर्शन और विश्वास का जीवंत दर्पण होती है।

संगोष्ठी में विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित प्रख्यात साहित्यकार रणेन्द्र ने मुंडारी और संस्कृत के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ऋग्वेद काल से ही संस्कृत पर मुंडारी का अमिट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने मानस के उपनिवेशीकरण के प्रभावों की चर्चा करते हुए साक्ष्यों के साथ स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओं के विकास में जनजातीय शब्दावलियों ने आधारभूत भूमिका निभाई है। उन्होंने ओल्ड टेस्टामेंट की फैमिली थ्योरी के स्थान पर स्पेक्ट्रम थ्योरी को अधिक प्रामाणिक बताया, जो भाषाई विविधता के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित करती है। प्रो अब्बी ने अंडमान की जनजातियों का उदाहरण देते हुए यह भी सिद्ध किया कि उनकी भाषाओं में आपदा प्रबंधन के ऐसे सूत्र छिपे थे, जिनके कारण सुनामी जैसी भयावह त्रासदी में भी उनकी जान सुरक्षित रही, जो यह दर्शाता है कि जनजातीय भाषाएं प्रकृति के साथ अटूट सामंजस्य रखती हैं।

अध्यक्षीय संबोधन प्रस्तुत करते हुए कुलपति प्रो चंद्र भूषण शर्मा ने दर्शन और संवेदना के धरातल पर भाषा की व्याख्या की। उन्होंने दो टूक कहा कि भाषा केवल व्याकरण का संग्रह नहीं बल्कि हमारे मानवीय होने का शाश्वत प्रमाण है। उन्होंने नई शिक्षा नीति के संदर्भ में भाषाई स्वायत्तता पर बल देते हुए विद्यार्थियों को अपनी वाचिक और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने हेतु प्रेरित किया। कुलपति ने विश्वविद्यालय की इस प्रतिबद्धता को दोहराया कि ज्ञान के इस महाकुंभ के माध्यम से वैश्विक स्तर के विद्वानों के विचारों का लाभ छात्र समुदाय को प्राप्त हो। इससे पूर्व कुलसचिव डॉ प्रणिता ने अतिथियों का स्वागत किया, डॉ विनोद रंजन ने विषय प्रवेश कराया और प्रो मिथिलेश कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ सुनील कुमार दुबे एवं डॉ अरुण कुमार मिश्रा द्वारा किया गया, जिसमें अकादमिक जगत के कई गणमान्य जन उपस्थित रहे।


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