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Editor: Naresh Prasad Soni
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गूंजे ब्रह्म संगीत के स्वर नवजागरण के ऐतिहासिक केंद्र ब्रह्म समाज में 'माघ उत्सव' पर उमड़ी आस्था, अतीत के गौरवशाली पन्नों को किया गया जीवंत

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गूंजे ब्रह्म संगीत के स्वर नवजागरण के ऐतिहासिक केंद्र ब्रह्म समाज में 'माघ उत्सव' पर उमड़ी आस्था, अतीत के गौरवशाली पन्नों को किया गया जीवंत




Hazaribagh: आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी 'हजारीबाग ब्रह्म समाज' के ऐतिहासिक प्रांगण में रविवार को भक्ति और संगीत की अविरल धारा प्रवाहित हुई। हजारीबाग में नवजागरण का शंखनाद करने वाली और 1867 में स्थापित इस प्रतिष्ठित संस्था में 'माघ उत्सव' का भव्य आयोजन किया गया, जहाँ श्रद्धालुओं ने परम सत्ता 'ब्रह्म' की आराधना कर अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। ज्ञात हो कि 1828 में राजा राममोहन राय द्वारा प्रज्ज्वलित की गई ब्रह्म समाज की ज्योति की वर्षगांठ को समर्पित यह दिवस हजारीबाग में पूरी गरिमा, सादगी और शास्त्रीय परंपरा के साथ मनाया गया।

समारोह का शुभारंभ वैदिक ऋचाओं के पाठ और गंभीर नाद के साथ हुआ, जिससे पूरा वातावरण पवित्र हो उठा। कोलकाता से विशेष रूप से पधारे आचार्य सुप्रतिम चक्रवर्ती ने वेदी का दायित्व संभालते हुए ईश्वर आराधना का संचालन किया। इस अवसर पर ब्रह्म संगीत और रबीन्द्र संगीत की स्वर लहरियों ने उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। गायन की प्रस्तुति दो अलग-अलग समूहों द्वारा दी गई। प्रथम समूह में कोलकाता के कलाकारों—एलोरा चक्रवर्ती, जयश्री दे और सुपर्णा नंदी—ने अपनी सुरीली तान छेड़ दी, तो वहीं दूसरे समूह में हजारीबाग की स्थानीय प्रतिभाओं—तापसी दास और सुलगना—ने अपने गायन से समां बांध दिया, जिससे पूरा हॉल भक्तिमय हो गया।

आचार्य सुप्रतिम चक्रवर्ती ने अपने उद्बोधन में हजारीबाग के इस ऐतिहासिक धरोहर के स्वर्णिम अतीत पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्मरण कराया कि किस प्रकार जदुनाथ मुखर्जी ने पुनर्जागरण के उद्देश्य से अपनी निजी भूमि दान देकर इस समाज की नींव रखी थी, जो देखते ही देखते तत्कालीन बंगाल प्रांत में सांस्कृतिक क्रांति का एक सशक्त केंद्र बन गया। यह वही पवित्र स्थल है जहाँ ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन और गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसी विभूतियों के चरण पड़े थे। समाज सुधार की दिशा में इस संस्था के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि 1930 के दशक में हरिजन समाज के उत्थान और शिक्षा हेतु यहाँ छह विद्यालय खोले गए थे, जिनमें से दो आज भी सरकारी विद्यालय के रूप में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं।

इतिहास के विस्मृत पन्नों को पलटते हुए आचार्य ने ब्रह्म समाज के पूर्व सचिव मनमथनाथ के त्याग और सेवाभाव का विशेष उल्लेख किया, जिनके कार्यों से प्रभावित होकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वयं उनसे भेंट करने हजारीबाग ब्रह्म समाज पधारे थे। कालांतर में खड़गोसिंहो घोष, देबप्रसाद घोष, उज्जवला घोष और शांति चटर्जी जैसे मनीषियों ने इस संस्था को पल्लवित और पुष्पित करने में महती भूमिका निभाई।

इस आध्यात्मिक समागम को सफल बनाने में वर्तमान सचिव नीलांजन चटर्जी, श्रीजीता चटर्जी, डॉ. दीपक कुंडू, अनिमा कुंडू, अतनु घोष, मीरा घोष तथा मैत्रेई और प्रदीप मुखर्जी ने केंद्रीय भूमिका का निर्वहन किया। विशेष रूप से संस्थापक जदुनाथ मुखर्जी के वंशज अमिताभ मुखर्जी और सजल मुखर्जी की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को और विशिष्ट बना दिया। कार्यक्रम के दौरान सुकल्याण मोइत्रा, सुजित भट्टाचार्यजी, अमित भौमिक, नरेंद्रनाथ दे, मौमिता मल्लिक, पायल मुखर्जी सहित नगर के अनेक गणमान्य बुद्धिजीवियों और श्रद्धालुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और इस पुनीत कार्य के साक्षी बने।


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