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Editor: Naresh Prasad Soni
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लौह अयस्क के कचरे से बनेंगी 'ग्रीन सड़कें' CSIR-CRRI और AMNS इंडिया के बीच ऐतिहासिक समझौता

लौह अयस्क कचरे (Iron Ore Waste) से बनेंगी इको-फ्रेंडली सड़कें। CSIR-CRRI और AMNS इंडिया के बीच हुए R&D समझौते से जुड़ी बड़ी खबर पढ़ें।
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लौह अयस्क के कचरे से बनेंगी 'ग्रीन सड़कें' CSIR-CRRI और AMNS इंडिया के बीच ऐतिहासिक समझौता

Delhi : सड़क निर्माण के क्षेत्र में भारत जल्द ही एक बड़ी क्रांति का गवाह बनने जा रहा है। अब लौह अयस्क (Iron Ore) के कचरे का इस्तेमाल सिर्फ डंपिंग ग्राउंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे देश भर में मजबूत और पर्यावरण के अनुकूल 'हरित सड़कें' (Green Roads) बनाई जाएंगी। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर, भारत के प्रमुख सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और इस्पात क्षेत्र की दिग्गज कंपनी आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील (AMNS) इंडिया ने इस दिशा में एक अहम अनुसंधान एवं विकास (R&D) समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के महानिदेशक और सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी

हर साल निकलता है 20 मिलियन टन कचरा

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के महानिदेशक और सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी ने इस समझौते के महत्व को समझाते हुए चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और 'कचरे से कंचन' (Waste to Wealth) की अवधारणा पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में फैले लौह अयस्क प्लांट से हर साल लगभग 18 से 20 मिलियन टन कचरा निकलता है। इसे आमतौर पर 'स्लाइम' कहा जाता है, जिसे बड़े-बड़े बांधों में स्टोर करना पड़ता है। यह कचरा पर्यावरण के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।

प्राकृतिक संसाधनों की होगी बचत

सड़क निर्माण में इस अपशिष्ट के उपयोग से दो बड़े फायदे होंगे:

कचरा प्रबंधन: खनन अपशिष्ट की बढ़ती समस्या का स्थायी समाधान मिलेगा।

संसाधनों की बचत: सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक संसाधनों (जैसे मिट्टी और पत्थर) की मांग में कमी आएगी, जिससे पर्यावरण का संतुलन बना रहेगा।

कैसे काम करेगी यह तकनीक?

इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व CSIR-CRRI के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख सतीश पांडे कर रहे हैं, जिन्हें 'स्टील स्लैग रोड तकनीक' का आविष्कारक भी माना जाता है। इस समझौते के तहत, CRRI के वैज्ञानिक इस कचरे की प्रयोगशाला में गहन जांच करेंगे। यह परखा जाएगा कि सड़क की अलग-अलग परतों में लौह अयस्क अपशिष्ट को किस तरह से और कितनी मात्रा में सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है।

एएमएनएस इंडिया के मुख्य सतत विकास अधिकारी डॉ. अरविंद बोधंकर ने इस साझेदारी की सराहना करते हुए कहा कि औद्योगिक उप-उत्पादों का यह इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण और सतत अवसंरचना विकास में एक मील का पत्थर साबित होगा।

इन आधुनिक तकनीकों का भी हुआ प्रदर्शन

इस खास मौके पर CSIR-CRRI ने सड़क निर्माण से जुड़ी कई अन्य अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रदर्शन किया, जिनमें प्रमुख हैं:

कृषि कचरे से बना बायो-बिटुमेन (Bio-Bitumen)।

गड्ढों की तुरंत मरम्मत करने वाली स्टील स्लैग आधारित 'इकोफिक्स' (Ecofix) तकनीक।

सड़कों के रखरखाव के लिए स्लैग और फ्लाई ऐश आधारित टेरासर्फेसिंग तकनीक।

इस पहल से यह साफ हो गया है कि भविष्य में भारत का सड़क नेटवर्क सिर्फ लंबा और चौड़ा ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से टिकाऊ और इको-फ्रेंडली भी होगा।

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