झारखंड में कॉर्पोरेट माफिया का आतंक? अंबा प्रसाद का NTPC पर गंभीर आरोप, कहा- न्यायालय की अवहेलना कर ढहाया गया पूर्व मंत्री का आशियाना
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| पूर्व विधायक अंबा प्रसाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान |
रांची, झारखंड। झारखंड की राजनीति में एक बार फिर जल-जंगल और ज़मीन का मुद्दा गरमा गया है। बड़कागांव की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने एक प्रेस वार्ता के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार सहित बड़ी औद्योगिक कंपनियों जैसे NTPC, CCL और Adani पर कॉर्पोरेट माफिया होने का संगीन आरोप लगाया है। अंबा प्रसाद का दावा है कि उनके परिवार को विस्थापन और रैयतों के हक की लड़ाई लड़ने के कारण जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
ताजा विवाद हजारीबाग में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के आवास और कारखाने को बुलडोजर से ढहाने को लेकर शुरू हुआ है, जिसे अंबा प्रसाद ने लोकतंत्र और संविधान की हत्या करार दिया है।
विस्थापन की लड़ाई और परिवार की कुर्बानी
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, अंबा प्रसाद ने कहा कि उनका परिवार पिछले 15 वर्षों से जनप्रतिनिधि के रूप में विस्थापितों और भू-अर्जन से प्रभावित रैयतों के लिए उचित मुआवजे और पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि इसी संघर्ष के कारण उनके पिता पूर्व मंत्री योगेंद्र साव, माता पूर्व विधायक निर्मला देवी और उनके भाई को वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा।
अंबा प्रसाद ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनके परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए अलग-अलग जेलों (दुमका, रामगढ़ और हजारीबाग) में रखा और माता-पिता को राज्य-बदर तक किया गया। उनका कहना है कि झारखंड के इतिहास में विस्थापन की लड़ाई के लिए उनके परिवार ने जितनी कुर्बानियां दी हैं, उतनी किसी और ने नहीं दी।
न्यायालय की अवहेलना और NTPC की कार्यशैली पर सवाल
अंबा प्रसाद ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि उच्च न्यायालय में मुआवजे और पुनर्वास से संबंधित कई मामले लंबित हैं। उन्होंने WP(C) No. 3579/2023 सहित कुल 6 मामलों के निर्णयों का जिक्र किया, जिसमें 83 प्रभावित रैयत शामिल हैं।
विवाद का मुख्य बिंदु
रैयतों की मांग है कि उन्हें RFCTLARR 2013 (भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013) के तहत मुआवजा मिलना चाहिए, न कि पुराने CBA एक्ट के तहत। भारत के राजपत्र के अनुसार, यदि 2015 तक मुआवजे का भुगतान नहीं हुआ है, तो 2013 के कानून के तहत नए सिरे से मुआवजा निर्धारण होना चाहिए। अंबा प्रसाद का आरोप है कि NTPC और प्रशासन इस कानून की अनदेखी कर रहे हैं।
नंगे पैर नाइटी में घसीटा गया पूर्व विधायक को - अंबा प्रसाद
घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए अंबा प्रसाद ने बताया कि 19 मार्च 2026 को करीब 2000 पुलिस बल की मौजूदगी में उनके घर को जमींदोज कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस दौरान उनकी माता और पूर्व विधायक निर्मला देवी के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।
मेरी माता जी को नाइटी पहने हुए अवस्था में, उनका फोन छीनकर, नंगे पैर पुलिस ने जबरन गाड़ी में बैठाया और थाने ले गई। उन्हें नाश्ता तक नहीं करने दिया गया और घर के कीमती सामान, जेवर व नकदी निकालने का मौका भी नहीं दिया गया।
उन्होंने दावा किया कि इस कार्रवाई से उनके परिवार को करीब 20-30 लाख रुपये का नुकसान हुआ है और यह सब तब हुआ जब मामला न्यायालय में लंबित था।
क्या संविधान का चौथा स्तंभ मौन रहेगा?
अंबा प्रसाद ने मीडिया और न्यायपालिका की भूमिका पर भी तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जब अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, तो क्या यह संविधान की विफलता नहीं है? उन्होंने राहुल गांधी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि संविधान मर रहा है।
उनका आरोप है कि NTPC ने ट्रिब्यूनल कोर्ट में गलत जानकारियां दीं और जानबूझकर मुआवजे का चेक तब तक रोकने की प्रार्थना की जब तक कि पीड़ित पक्ष अपने आपराधिक मुकदमे वापस न ले ले। उन्होंने प्रशासन से सवाल किया कि क्या उनके पास घर तोड़ने का कोई लिखित अदालती आदेश था?
अबुआ राज या बाबुओं का राज?
अंबा प्रसाद ने अंत में जनता से सवाल किया कि क्या झारखंड का निर्माण इसीलिए हुआ था कि यहां के मूल निवासियों की जमीन कौड़ियों के भाव छीन ली जाए? उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर तंज कसते हुए पूछा कि क्या यह वाकई अबुआ राज (अपना राज) है या फिर पूंजीपतियों और बाबुओं का राज बनकर रह गया है?
इस प्रेस वार्ता ने राज्य में औद्योगिक विकास बनाम जन-अधिकार की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। अब देखना यह है कि NTPC और जिला प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं।

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