संसद में गूंजी 'पीरियड्स' पर चुप्पी तोड़ने की आवाज: राघव चड्ढा ने मेंस्ट्रुअल हेल्थ के लिए मांगे ये 6 बड़े अधिकार
"Aap Mp Raghav Chadha ki file photo"

नई दिल्ली: भारत में आज भी 'पीरियड्स' या माहवारी एक ऐसा विषय है जिसे बंद कमरों में फुसफुसाहट के साथ चर्चा का हिस्सा बनाया जाता है। लेकिन हाल ही में संसद के पटल पर आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने इस खामोशी को तोड़ते हुए देश की आधी आबादी के स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मेंस्ट्रुअल हेल्थ (Menstrual Health) कोई 'चैरिटी' या दया का विषय नहीं है, बल्कि यह महिलाओं का मौलिक अधिकार है।
आंकड़ों की भयावह तस्वीर
राघव चड्ढा ने सदन में चौकाने वाले आंकड़े पेश करते हुए बताया कि भारत में लगभग 35 करोड़ महिलाएं मेंस्ट्रुअल साइकिल की प्रक्रिया से गुजरती हैं। इनमें से 12 करोड़ किशोरियां हैं जिन्हें हर साल स्वच्छता और सुविधाओं के अभाव में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे विचलित करने वाला आंकड़ा यह है कि हर साल करीब 2.3 करोड़ लड़कियां केवल इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि वहां न तो साफ पानी उपलब्ध है, न पैड और न ही गोपनीयता (Privacy)।
6 सूत्रीय मांगें: जो बदल सकती हैं देश की सूरत
सांसद ने केवल समस्या ही नहीं गिनाई, बल्कि सरकार के सामने छह स्पष्ट सुझाव (Demands) भी रखे, जो इस प्रकार हैं:
मुफ्त सैनिटरी पैड: हर स्कूल, कॉलेज, कार्यस्थल और सार्वजनिक संस्थानों में मुफ्त सैनिटरी पैड और क्रियाशील शौचालयों की व्यवस्था अनिवार्य हो।
डोर-स्टेप एक्सेस: आंगनवाड़ी, आशा नेटवर्क और हेल्थ सेंटर्स के जरिए हर घर तक किफायती या मुफ्त मेंस्ट्रुअल उत्पाद पहुंचाए जाएं।
GST में राहत: मेंस्ट्रुअल उत्पादों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर से पूरी तरह GST हटाया जाए ताकि इनकी लागत कम हो सके।
लड़कों की शिक्षा: स्कूलों में केवल लड़कियों को ही नहीं, बल्कि लड़कों को भी मेंस्ट्रुअल हेल्थ की शिक्षा दी जाए। जब तक लड़के इस विज्ञान को नहीं समझेंगे, समाज का 'स्टिग्मा' या शर्म खत्म नहीं होगी।
वेस्ट मैनेजमेंट: पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको-फ्रेंडली डिस्पोजल सिस्टम के लिए एक नेशनल फ्रेमवर्क तैयार किया जाए।
डिस्ट्रिक्ट लेवल मॉनिटरिंग: हर जिले में मेंस्ट्रुअल इंफ्रास्ट्रक्चर की वार्षिक निगरानी हो और उसकी सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए।
"शराब सरेआम, पैड अखबार में क्यों?"
चड्ढा ने भारतीय समाज की विडंबना पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हमारे देश में शराब और सिगरेट तो सरेआम बेची जाती हैं, लेकिन सैनिटरी पैड को आज भी दुकानदार अखबार में लपेटकर ऐसे देता है जैसे कोई 'गैर-कानूनी' सामान हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि "पीरियड नेचुरल है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द की चुप्पी अननेचुरल (अप्राकृतिक) है।"
निष्कर्ष: अधिकार बनाम सहानुभूति
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सरकार और समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि महिलाओं को सहानुभूति या टोकनवाद (Tokenism) की जरूरत नहीं है। उन्हें शिक्षा, समानता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार चाहिए। संसद में उठाई गई यह आवाज केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं है, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं की उस पीड़ा का प्रतिनिधित्व है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया गया है।
"पैड पर GST कम होना चाहिए या नहीं? अपनी राय दें।" इससे फेसबुक का एल्गोरिथम पोस्ट की रीच बढ़ा देता है।
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