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Editor: Naresh Prasad Soni
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शहीद-ए-आजम की याद में विभावि का राजनीति विज्ञान विभाग: डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने युवाओं को दिया 'क्रांतिकारी वैचारिकी' का मंत्र

विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में बलिदान दिवस पर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को दी गई श्रद्धांजलि। डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने भगत सिंह के विचारों
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शहीद-ए-आजम की याद में विभावि का राजनीति विज्ञान विभाग  डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने युवाओं को दिया क्रांतिकारी वैचारिकी का मंत्र
विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते विभागाध्यक्ष डॉ. सुकल्याण मोइत्रा, शिक्षक एवं शोधार्थी-1

हजारीबाग: विनोबा भावे विश्वविद्यालय (विभावि) के राजनीति विज्ञान विभाग में सोमवार को 'बलिदान दिवस' के गौरवशाली अवसर पर एक विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले अमर शहीद भगत सिंह, शिवराम हरी राजगुरु और सुखदेव थापर को अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया गया। विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों ने महान क्रांतिकारियों के जीवन दर्शन पर गंभीर चर्चा की।

  • विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते विभागाध्यक्ष डॉ. सुकल्याण मोइत्रा, शिक्षक एवं शोधार्थी।

भगत सिंह की पुस्तकें बनें आधुनिक युग का मार्गदर्शक - डॉ. सुकल्याण मोइत्रा

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने अपने संबोधन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार साझा किया। उन्होंने कहा कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा थे। डॉ. मोइत्रा ने जोर देकर कहा, भगत सिंह द्वारा जेल की सलाखों के पीछे लिखी गई पुस्तकें और उनके विचार आज के आधुनिक भारत के युवाओं के लिए गीता, बाइबल और कुरान की तरह पवित्र और मार्गदर्शक होनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि यह राष्ट्र सदियों तक इन तीनों महान सपूतों का ऋणी रहेगा, जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में अपने प्राणों की आहुति देकर सोए हुए भारत को जगाने का काम किया। डॉ. मोइत्रा के अनुसार, वर्तमान पीढ़ी को केवल उनके नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके लिखे साहित्य को पढ़कर एक तार्किक समाज का निर्माण करना चाहिए।

राष्ट्रवाद और मानवतावाद का अद्भुत मिश्रण

विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अजय बहादुर सिंह ने भगत सिंह के व्यक्तित्व के एक अलग पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने उन्हें एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी की संज्ञा दी। डॉ. सिंह ने कहा कि भगत सिंह में क्रांति की ज्वाला और दर्शन की गहराई का एक अद्भुत मिश्रण था। वे केवल हथियार उठाना नहीं जानते थे, बल्कि उनके पास हर घटना का एक सटीक तर्कसंगत विश्लेषण था। वे एक ऐसे मानवतावादी थे जो समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकार के लिए लड़ रहे थे।

जेल की 116 दिनों की भूख हड़ताल और इंकलाब की गूंज

शोधार्थी धर्मेंद्र ने भगत सिंह की जीवन यात्रा का भावुक विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे जलियांवाला बाग के भीषण नरसंहार ने एक छोटे से बालक के मन में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आक्रोश भर दिया और वे राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ गए। धर्मेंद्र ने असेंबली में बम धमाके के पीछे की उस सोच को भी विस्तार से समझाया, जिसका उद्देश्य "बहरों को सुनाना" था, न कि किसी की जान लेना। उन्होंने जेल के भीतर कैदियों के अधिकारों के लिए की गई 116 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल को याद करते हुए बताया कि कैसे "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा आज भी देश की रगों में दौड़ता है।

धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच का आह्वान

शोधार्थी रवि कुमार विश्वकर्मा ने भगत सिंह के दर्शन (Philosophy) पर चर्चा करते हुए बताया कि उनका राष्ट्रवाद मानव केंद्रित था। भगत सिंह किसी भी प्रकार के धार्मिक पाखंड या जातिगत भेदभाव के कड़े विरोधी थे। उन पर कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन जैसे महान विचारकों का गहरा प्रभाव था, जिसके कारण वे पूंजीवाद और शोषणकारी व्यवस्था को जड़ से मिटाना चाहते थे। रवि ने कहा, भगत सिंह भारत को अंधभक्तों का झुंड नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सोच वाला प्रगतिशील राष्ट्र बनाना चाहते थे।

मैं नास्तिक क्यों हूँ' पर गहन विमर्श

कार्यक्रम के अंत में शोधार्थी महेंद्र पंडित ने भगत सिंह की सुप्रसिद्ध पुस्तक 'Why I am an Atheist' (मैं नास्तिक क्यों हूँ) पर अपने विचार रखे। महेंद्र ने उन सवालों को दोहराया जो भगत सिंह ने जेल में रहते हुए ईश्वर और व्यवस्था से पूछे थे—कि यदि ईश्वर है, तो दुनिया में युद्ध, शोषण और जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं क्यों होती हैं? महेंद्र ने स्पष्ट किया कि भगत सिंह का नास्तिक होना किसी धर्म के प्रति द्वेष नहीं था, बल्कि एक न्यायपूर्ण और तर्क आधारित समाज की स्थापना की उनकी तड़प थी।

इस गरिमामयी अवसर पर प्रथम और चतुर्थ समसत्र के विद्यार्थी और भारी संख्या में शोधार्थी मौजूद थे, जिन्होंने शहीदों के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लिया।

Naresh Soni Editor in Chief (News Prahari)

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