हजारीबाग: जब सिस्टम 'मर' जाए तो बस 'आह' निकलती है! 70 दिन तक बुजुर्ग पिता को भटकाया, सांसद की फटकार के बाद 3 घंटे में मिला मृत्यु प्रमाण पत्र
डाड़ी प्रखंड कार्यालय की शर्मनाक कार्यशैली: 34 वर्षीय पुत्र को खोने वाले पिता की लाचारी पर भारी पड़ी अफसरशाही, सांसद मनीष जायसवाल ने दी 24 घंटे की चेतावनी।
हजारीबाग (न्यूज़ प्रहरी डेस्क)।
झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था आज किस कदर संवेदनहीन हो चुकी है, इसकी एक बानगी उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के हजारीबाग जिले में देखने को मिली। जिस सिस्टम को जनता का 'सेवक' होना चाहिए था, वही सिस्टम एक शोकाकुल पिता के लिए प्रताड़ना का केंद्र बन गया। मामला डाड़ी प्रखंड कार्यालय का है, जहाँ एक बुजुर्ग पिता को अपने जवान बेटे के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए करीब 70 दिनों तक दफ्तरों की खाक छाननी पड़ी।
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| रंजन चौधरी (सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग) |
घटना का हृदयविदारक पहलू
गिद्दी-ए निवासी सियाराम सिंह ने बीते 16 फरवरी 2026 को एक सड़क दुर्घटना में अपने 34 वर्षीय पुत्र गौरव कुमार को खो दिया। जवान बेटे की अर्थी को कंधा देने वाले पिता के लिए सरकारी तंत्र संबल बनने के बजाय दीवार बन गया। सभी कानूनी और विभागीय प्रक्रियाएं पूरी होने के बावजूद, ब्लॉक के कर्मचारी उन्हें चक्कर कटवाते रहे। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी मशीनरी किसी 'सुविधा शुल्क' के इंतजार में थी या बुजुर्गों की बेबसी अफसरों के लिए महज एक फाइल थी?
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| Death certificate issued. |
सांसद मनीष जायसवाल का कड़ा रुख और 3 घंटे का 'चमत्कार'
जब यह मामला हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र के सांसद मनीष जायसवाल के संज्ञान में आया, तो वे स्वयं डाड़ी प्रखंड कार्यालय पहुँचे। वहां का नजारा भयावह था—कुर्सियां खाली थीं, सन्नाटा पसरा था और बीडीओ द्वारा जनप्रतिनिधि का फोन तक नहीं उठाया जा रहा था। सांसद ने इसे अफसरशाही की पराकाष्ठा बताते हुए प्रशासन को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया।
आश्चर्य की बात यह है कि जो काम पिछले 70 दिनों से अटका हुआ था, वह सांसद की एक डांट के बाद महज 3 घंटे के भीतर पूरा हो गया और पीड़ित परिवार को व्हाट्सएप पर प्रमाण पत्र मिल गया।
व्यवस्था के 'आईसीयू' में होने का प्रमाण
सांसद प्रतिनिधि रंजन चौधरी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में झारखंड की वर्तमान शासन व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाए गए हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि बिना किसी रसूख या जनप्रतिनिधि के हस्तक्षेप के, एक साधारण नागरिक के लिए अपना हक पाना भी दूभर है। क्या हर नागरिक को अपना हक पाने के लिए सांसद का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा?
अधिकारी या लोक सेवक?
सांसद मनीष जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि वे इस निकम्मेपन के खिलाफ चुप नहीं बैठेंगे। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि उन दोषी बाबुओं और अधिकारियों पर कार्रवाई चाहती है जिन्होंने एक बुजुर्ग को अपमानित किया। इस घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि झारखंड के ब्लॉक कार्यालयों में 'रिश्वतखोरी और लेटलतीफी' एक स्थायी शिष्टाचार बन चुकी है।
संपादकीय टिप्पणी:
अगर एक मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी किसी सांसद को धरने पर बैठने की चेतावनी देनी पड़े, तो यह मान लेना चाहिए कि सरकारी तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है। सरकार को चाहिए कि ऐसे लापरवाह कर्मचारियों को तत्काल बर्खास्त करे ताकि भविष्य में किसी 'सियाराम सिंह' को सिस्टम के आगे घुटने न टेकने पड़ें।
"कुर्सी का गुरूर नहीं, सेवा का संकल्प महान होना चाहिए, तुम्हारी कलम की स्याही में गरीब का सम्मान होना चाहिए।"
प्रस्तुति: रंजन चौधरी (सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग)
रिपोर्ट: न्यूज़ प्रहरी प्रधान सम्पादक।


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