🏛️ हजारीबाग: आपातकाल लोकतंत्र के इतिहास पर सबसे बड़ा कलंक; प्रेस क्लब में विचार गोष्ठी का आयोजन, जेपी आंदोलनकारियों ने साझा किए संस्मरण
हजारीबाग: देश में 25 जून 1975 को लगाए गए 21 महीनों के आपातकाल की 51वीं बरसी के अवसर पर गुरुवार को पुराना समाहरणालय परिसर स्थित हजारीबाग प्रेस क्लब में एक विशेष विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिला लोक समिति और 'जागृति' के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस गोष्ठी का मुख्य विषय "आपातकाल 25 जून 1975: लोकतंत्र के लिए कलंक" था। कार्यक्रम की अध्यक्षता जेपी आंदोलनकारी रहे वरिष्ठ अधिवक्ता स्वरूपचंद जैन ने की। गोष्ठी की शुरुआत लोकनायक जयप्रकाश नारायण की तस्वीर पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन करने के साथ हुई।
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| JP movement veteran advocate Swarupchand Jain along with other dignitaries paying tribute to Loknayak JP during a seminar on the 51st anniversary of Emergency at Hazaribagh Press Club. |
🚫 लोकतंत्र में असहमति का स्वर जरूरी, नागरिक स्वतंत्रताओं का हुआ था हनन
विषय प्रवेश कराते हुए नव भारत जागृति केंद्र के कार्यक्रम प्रबंधक रीतेश कुमार गोप ने कहा कि लोकतंत्र की असली खूबसूरती असहमति के स्वरों में निहित होती है। आपातकाल के काले दौर में इसी असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी, यही वजह है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में उस कालखंड को एक कलंक के तौर पर देखा जाता है।
आपातकाल के समय छात्र आंदोलनकारी की भूमिका निभा चुके हरीश श्रीवास्तव ने उस दौर के संघर्षों को याद करते हुए कहा कि हजारीबाग के अनेकों परिवार और उनके बच्चों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उन्होंने रेखांकित किया कि इस आंदोलन की सफलता के पीछे प्रेस की आजादी, अभिभावकों की सहमति, प्रशासन की मदद और सबसे बढ़कर लोकनायक जयप्रकाश नारायण का कुशल व निस्वार्थ नेतृत्व था, जो सत्ता नहीं बल्कि संपूर्ण 'व्यवस्था परिवर्तन' के पक्षधर थे।
👥 वक्ताओं ने कहा: अपनी सत्ता और दल को बचाने के लिए देश पर लादा गया था आपातकाल
गोष्ठी को संबोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रखरता से रखे:
अरविंद सहाय ने उस समय की विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं में आपसी संघर्ष और सहयोग का उल्लेख करते हुए युवाओं पर पड़े इसके गहरे प्रभाव की चर्चा की।
अधीन महतो ने कहा कि आपातकाल ने नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को छीन लिया था। इसके साथ ही उन्होंने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नागरिकों को अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की बात कही।
अमरदीप यादव ने जेपी को एक सच्चा देशभक्त बताते हुए कहा कि अक्सर लोकतंत्र की असफलता के पीछे सरकारी पदाधिकारियों की उदासीनता का बड़ा हाथ रहता है।
श्यामकिशोर और अशोक यादव ने आंदोलन के जनभागीदारी के महत्व और अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि गलत नीतियों का विरोध हमेशा होना चाहिए।
बटेश्वर मेहता ने वर्तमान और भविष्य के शासकों को आपातकाल जैसी दमनकारी परिस्थितियों से बचने की सलाह दी।
प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने आपातकाल को लोकतंत्र के लिए एक गहरा धब्बा बताते हुए कहा कि युवाओं ने इसके विरोध में अपनी जवानी तक कुर्बान कर दी, जबकि अपनी सत्ता और राजनीतिक दल को बचाने की फिक्र में देश पर इसे जबरन लादा गया था।
⚖️ नई पीढ़ी को लोकतंत्र का महत्व समझाना जरूरी: स्वरूपचंद जैन
अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ अधिवक्ता स्वरूपचंद जैन ने कड़े शब्दों में कहा कि नागरिक अधिकारों का हनन करना एक बेहद गंभीर अपराध है, जिसे तत्कालीन सरकार ने आपातकाल लगाकर अंजाम दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को लोकतंत्र के वास्तविक महत्व और अधिकारों से परिचित कराना है, ताकि भविष्य में फिर कभी कोई शासक देश में ऐसी हिमाकत करने का साहस न कर सके।
इस वैचारिक गोष्ठी को संबोधित करने वाले अन्य मुख्य वक्ताओं में विनोद सिंह, मुअज्ज़म आलम, अरविंद झा, संजय कुमार और मेहर रहमान सहित कई प्रबुद्ध जीवी शामिल थे। कार्यक्रम के अंतिम चरण में आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी जान न्योछावर करने वाले देश के वीर युवाओं के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।
