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Editor: Naresh Prasad Soni
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मांदर की थाप पर थिरके कांग्रेस नेता मुन्ना सिंह, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश

हजारीबाग के बहोरनपुर में प्रकृति पर्व सरहुल की धूम। पूर्व प्रत्याशी मुन्ना सिंह ने मांदर की थाप पर किया नृत्य, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश।
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मांदर की थाप पर थिरके कांग्रेस नेता मुन्ना सिंह, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश
Sarhul Festival Hazaribagh Munna Singh

हजारीबाग (न्यूज़ प्रहरी): झारखंड की पावन धरा पर प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं के मिलन का महापर्व 'सरहुल' पूरे राजकीय उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में हजारीबाग सदर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सदर प्रखंड की गुरहेत पंचायत स्थित बहोरनपुर गांव में सरहुल का आयोजन बेहद खास रहा। इस उत्सव में परंपरा, संस्कृति और आधुनिकता का अनूठा संगम देखने को मिला, जहां पूर्व सदर विधानसभा प्रत्याशी मुन्ना सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत कर ग्रामीणों का उत्साह दोगुना कर दिया।

पारंपरिक स्वागत और रीति-रिवाज

Sarhul Festival Hazaribagh Munna Singh-2

कार्यक्रम की शुरुआत झारखंडी संस्कृति के अनुरूप भव्य स्वागत से हुई। आयोजन समिति के सदस्यों, जिनमें गुरहेत पंचायत के मुखिया महेश तिग्गा, सुरेश तिग्गा, प्रीतम तिग्गा और बसंत केरकेट्टा शामिल थे, ने मुन्ना सिंह का पारंपरिक तरीके से गर्मजोशी भरा अभिनंदन किया।

सरहुल की सबसे विशिष्ट परंपरा के अनुसार, मुख्य पहान ने मुन्ना सिंह को सखुआ (साल) का पवित्र फूल भेंट किया। यह फूल न केवल प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है, बल्कि आने वाले समृद्ध वर्ष और खुशहाली का आशीर्वाद भी माना जाता है।

मांदर की थाप और सामुदायिक नृत्य

उत्सव का मुख्य आकर्षण वह पल रहा जब मुन्ना सिंह खुद को झारखंडी लोक धुनों से रोक नहीं पाए। मांदर की गूंज और लोक गीतों के बीच उन्होंने स्थानीय ग्रामीण भाई-बहनों के साथ कदम से कदम मिलाकर पारंपरिक नृत्य किया। सफ़ेद धोती और माथे पर पगड़ी पहने ग्रामीणों के बीच मुन्ना सिंह का यह सहज अंदाज चर्चा का विषय बना रहा। उन्होंने आदिवासी संस्कृति की जीवंतता को करीब से महसूस किया और कहा कि यह लयबद्धता ही हमारे समाज की असली ताकत है।

मुन्ना सिंह का संबोधन: प्रकृति और संस्कृति का संरक्षण

उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए मुन्ना सिंह ने सरहुल के गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा:

"सरहुल केवल एक त्योहार या कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी अटूट आस्था, पर्यावरण संरक्षण और अटूट सामुदायिक एकता का जीवंत प्रतीक है। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब हमारी आदिवासी संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर कैसे जिया जाता है।"

उन्होंने आगे अपील की कि हमें केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए हर दिन जागरूक रहना होगा। उन्होंने समस्त क्षेत्रवासियों को सरहुल की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए सुख-समृद्धि की कामना की।

ग्रामीणों की भारी भागीदारी

इस गरिमामय अवसर पर समाज के हर वर्ग के लोग उपस्थित थे। मुख्य रूप से बैहरी पंचायत के मुखिया पवन यादव, विक्की कुमार धान, दिनेश यादव, शंभू केरकेट्टा, सुभास्तम केरकेट्टा, प्रसन केरकेट्टा, सुनील तिग्गा, अरुण केरकेट्टा, नितेश केरकेट्टा, विक्रम केरकेट्टा, सुरेश केरकेट्टा, नीरज कुमार और मधु केरकेट्टा सहित सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष और बच्चे मौजूद रहे। पूरे बहोरनपुर गांव में उत्सव का माहौल ऐसा था मानो पूरी प्रकृति स्वयं नृत्य कर रही हो।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सरहुल, जिसे 'बा परब' भी कहा जाता है, साल के वृक्षों में नए फूल आने की खुशी में मनाया जाता है। बहोरनपुर की इस सभा में बुजुर्गों ने बताया कि यह पर्व धरती माता और सूर्य देव के विवाह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। गांव के अखड़ा में हुए इस आयोजन ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि विकास की दौड़ में भी हजारीबाग अपनी जड़ों को नहीं भूला है।

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