नावाडीह में गूंजा कुड़माली भाषा और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प; 'जडुआही' कार्यक्रम में उमड़ा जनसैलाब
"भाषा बचेगी तभी बचेगा अस्तित्व"— कुडमी समाज के मंच से 'मिशन जनगणना 2026' के तहत अपनी पहचान दर्ज कराने का आह्वान।
नावाडीह: कुड़माली भाषा और संस्कृति के पुनरुत्थान हेतु 'जडुआही' कार्यक्रम का भव्य आयोजन
नावाडीह (बोकारो): झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और मातृभाषा के संरक्षण की दिशा में नावाडीह की धरती पर एक ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कुडमी समाज द्वारा आयोजित 'कुड़माली भाखी चारि जागरन जडुआही' कार्यक्रम में समाज के हजारों लोगों ने शिरकत की। इस मंच से न केवल भाषा और संस्कृति को बचाने की हुंकार भरी गई, बल्कि आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का कड़ा संदेश भी दिया गया।
![]() |
| Shabha ko sambodhit mukhya-atithi karte jayaram kumar mahto |
भाषा केवल माध्यम नहीं, हमारी पहचान है -जयराम कुमार महतो।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डुमरी विधायक टाइगर जयराम कुमार महतो ने स्पष्ट किया कि कुड़माली भाषा केवल आपसी बोलचाल का एक जरिया मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की विरासत और हमारी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने कहा कि "भाषा बचाओ, संस्कृति बचाओ" का नारा आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक हमारी मातृभाषा जीवित है, तब तक समाज का अस्तित्व और गौरव सुरक्षित है। मंच से समाज के लोगों को आपसी सहयोग और एकजुटता के लिए प्रेरित किया गया, ताकि सामाजिक बुराइयों को दूर कर एक सशक्त समाज का निर्माण किया जा सके।
![]() |
| Kurmi samaaj |
नई पीढ़ी और मातृभाषा का गौरव
वर्तमान समय में आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी अपनी मूल भाषा से दूर होती जा रही है। इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कार्यक्रम में कहा गया कि युवाओं को कुड़माली बोलने में शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस होना चाहिए। अपनी जड़ों की ओर लौटना ही समाज के पुनरुत्थान का एकमात्र मार्ग है। आज का यह 'जडुआही' कार्यक्रम केवल एक औपचारिक सभा नहीं है, बल्कि यह कुडमी समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक जागरण का शंखनाद है।
मिशन जनगणना 2026: "जतना कुड़मी, उतना कुड़मालि"
कार्यक्रम का एक प्रमुख केंद्र बिंदु 'मिशन जनगणना 2026' रहा। समाज के प्रबुद्ध जनों ने आह्वान किया कि "जतना कुड़मी, उतना कुड़मालि" के संदेश को हर घर तक पहुँचाना अनिवार्य है। उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि आगामी जनगणना में अपनी पहचान और मातृभाषा के रूप में 'कुड़मालि' को ही दर्ज कराएं। ऐसा करने से ही समाज की वास्तविक जनसंख्या और सांस्कृतिक गहराई का सही आंकड़ा शासन और प्रशासन के समक्ष आ सकेगा, जो भविष्य के हक-अधिकारों की लड़ाई के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
सांस्कृतिक संरक्षण का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित जनसमूह ने सामूहिक रूप से अपनी भाषा, रीति-रिवाज और परंपराओं के संरक्षण का संकल्प लिया। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि अपने हक-अधिकारों के लिए सामाजिक रूप से जागरूक और एकजुट होना समय की मांग है। इस कार्यक्रम ने कुडमी समाज के भीतर नई ऊर्जा का संचार किया है, जिसका असर आने वाले समय में भाषाई आंदोलन के रूप में देखने को मिलेगा।


No comments
Post a Comment