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Editor: Naresh Prasad Soni
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व्यवस्था की बलि चढ़ी संवेदना: ₹19,300 के लिए कंधे पर बहन का कंकाल लादकर बैंक पहुँचा भाई, ओडिशा की इस तस्वीर ने देश को रुलाया

ओडिशा के जीतू मुंडा ने ₹19,300 के लिए बहन की कब्र खोदी और कंकाल लेकर बैंक पहुँचे। सिस्टम की संवेदनहीनता और गरीबी की पराकाष्ठा की व्यथा।
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व्यवस्था की बलि चढ़ी संवेदना: ₹19,300 के लिए कंधे पर बहन का कंकाल लादकर बैंक पहुँचा भाई, ओडिशा की इस तस्वीर ने देश को रुलाया

'डिजिटल इंडिया' और 'बढ़ती अर्थव्यवस्था' के दावों के बीच जीतू मुंडा की बेबसी; नियमों की बेड़ियों ने मानवता को किया शर्मसार।

ओडिशा: जब सिस्टम अंधा हो जाता है और नियम संवेदनाओं से ऊपर निकल जाते हैं, तो समाज में जीतू मुंडा जैसी कहानियाँ जन्म लेती हैं। ओडिशा से आई एक तस्वीर ने सोशल मीडिया और मुख्यधारा की राजनीति में हलचल मचा दी है। यह कहानी है एक भाई की, जिसने अपनी बहन की मौत के दो महीने बाद उसकी कब्र सिर्फ इसलिए खोद दी क्योंकि बैंक को उसकी मौत का 'जीवंत' प्रमाण चाहिए था।

ट्वीटर पर वायरल पोस्ट.


क्या है पूरी घटना?

ओडिशा के रहने वाले जीतू मुंडा की बहन कालरा मुंडा की मृत्यु दो महीने पहले हो गई थी। मरने से पहले कालरा ने अपने भाई को बताया था कि उनके बैंक खाते (ओडिशा ग्रामीण बैंक) में 19,300 रुपये जमा हैं। जीतू के लिए यह राशि कोई मामूली रकम नहीं, बल्कि जीवन जीने का सहारा थी।

जब जीतू बैंक पहुँचे, तो कर्मचारियों ने नियमों का हवाला देते हुए 'खाताधारक की उपस्थिति' या 'डेथ सर्टिफिकेट और कानूनी वारिस' होने का प्रमाण माँगा। एक गरीब और अशिक्षित व्यक्ति के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर सर्टिफिकेट बनवाना किसी पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन कार्य था।

5 किलोमीटर का वह 'खौफनाक' सफर

हताशा और जानकारी के अभाव में जीतू ने वह रास्ता चुना जो रूह कंपा देने वाला था। उन्होंने अपनी बहन की कब्र खोदी, कंकाल को एक बोरी में भरा और उसे कंधे पर लादकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुँच गए। रास्ते में देखने वाले लोग स्तब्ध थे, लेकिन उस भाई के सिर पर अपनी बहन की आखिरी वसीयत पूरी करने और अपनी गरीबी मिटाने का जुनून सवार था।

सिस्टम की विफलता और अर्थव्यवस्था के दावे

यह घटना उस समय आई है जब भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह तरक्की जीतू मुंडा जैसे लोगों तक पहुँची है?

  • लालफीताशाही (Red Tapism): क्या बैंक कर्मचारी इस मामले में मानवीय आधार पर वेरिफिकेशन नहीं कर सकते थे?

  • प्रशासनिक शिथिलता: डेथ सर्टिफिकेट जैसी बुनियादी प्रक्रिया का इतना जटिल होना कि एक व्यक्ति कब्र खोदने को मजबूर हो जाए, प्रशासन की विफलता है।

निष्कर्ष

जीतू मुंडा की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस 'असल भारत' की है जो आज भी कागजों के बोझ तले दबा हुआ है। यह घटना मानवीय संवेदनाओं की कमी और जागरूकता के अभाव का एक ऐसा दस्तावेज है, जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।

 इस घटना की वास्तविकता की पुस्ती न्यूज़ प्रहरी नहीं करता .यह खबर ट्वीटर हेंडल से लिया गया है व्यवस्था की बलि चढ़ी संवेदना: ₹19,300 के लिए कंधे पर बहन का कंकाल लादकर बैंक पहुँचा भाई, ओडिशा की इस तस्वीर ने देश को रुलाया

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