राष्ट्रीय नवनिर्माण सेना के संस्थापक अंशुमान सिन्हा का बड़ा बयान: 'पीएम और अबुआ आवास में 20 से 30 हजार रुपये ली जा रही रिश्वत'
2 लाख 40 हजार की आवास योजना में 40 हजार रुपये तक घूस लेने का आरोप; रोजगार सेवक द्वारा जियो टैग के नाम पर वसूली का दावा।
नरेश सोनी प्रधान सम्पादक न्यूज़ प्रहरी।
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| Anshuman Sinha |
अंशुमान सिन्नेहा सरकारी दफ्तरों में आम जनता के अधिकारों की वकालत करते हुए रिश्वतखोरी पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं को जानने, समझने और लाभ लेने का जनता को पूरा अधिकार है और जबरन रिश्वत लेना बिल्कुल अनुचित है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि पूरे झारखंड में ब्लॉक स्तर पर 'पीएम आवास' और 'अबुआ आवास' जैसी कल्याणकारी योजनाओं में जनता से 20,000 से लेकर 30,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इस खेल में मुखिया, रोजगार सेवक, बीडीओ (BDO), सीओ (CO) और अंचल कर्मचारी बेधड़क शामिल हैं। उन्होंने गणित समझाते हुए कहा कि 2,40,000 रुपये की इस योजना में अगर 40,000 रुपये रिश्वत में ही चले जाएंगे, तो एक गरीब आदमी के पास क्या बचेगा; उसकी पूरी पूंजी तो जमीन पर मकान खड़ा करने से पहले ही खत्म हो जाएगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि रोजगार सेवक 'जियो टैगिंग' करने के एवज में पहले ही आम जनता से 10,000 रुपये ऐंठ लेते हैं।
मनरेगा, लेबर कार्ड और गरीबों के खातों में सेंधमारी:
व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने आगे लिखा कि यही दयनीय हाल 'लेबर कार्ड' (श्रमिक कार्ड) योजना का भी है। भोले-भाले गरीबों के पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग करके उनके बैंक खातों से पैसे निकाल लिए जाते हैं और खुद हजारों डकारने वाले दलाल उस गरीब को महज 100 रुपये थमा देते हैं। मनरेगा योजना का भी धरातल पर पूरा दुरुपयोग किया जा रहा है। बिचौलियों और दलालों के इसी मकड़जाल के कारण सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला वास्तविक लाभ आम जनता और जरूरतमंदों के पास तक पहुंच ही नहीं पा रहा है।
संपादकीय दृष्टिकोण / संपादकीय टिप्पणी (Sampadakiye)
राष्ट्रीय नवनिर्माण सेना के प्रमुख अंशुमान सिंह द्वारा सोशल मीडिया पर उठाया गया यह मुद्दा कोई नया नहीं है, लेकिन यह उस कड़वी हकीकत को बयां करता है जिससे झारखंड का हर गरीब रोजाना दो-चार होता है। 'पीएम आवास' और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'अबुआ आवास' योजना का उद्देश्य उन लोगों को छत देना है जिनके पास रहने को पक्का मकान नहीं है। ऐसे में यदि 2.40 लाख रुपये की राशि में से 30 से 40 हजार रुपये सिर्फ ब्लॉक के बाबुओं, बिचौलियों और जनप्रतिनिधियों की जेबें गर्म करने में चले जाएं, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक विफलता है बल्कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या भी है।
सरकारी अधिकारियों (BDO, CO) और रोजगार सेवकों पर सीधे तौर पर नाम लेकर लगाए गए ये आरोप बेहद गंभीर हैं। डिजिटल इंडिया और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के दौर में भी अगर लेबर कार्ड और बैंक खातों से पैसे निकालकर गरीबों को ठगा जा रहा है, तो हमारी निगरानी प्रणालियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। सरकार और उच्च अधिकारियों को सोशल मीडिया पर आए इस दर्द और आक्रोश को गंभीरता से लेना चाहिए। जब तक प्रखंड स्तर के भ्रष्ट अधिकारियों और दलालों पर विजिलेंस (सतर्कता विभाग) का डंडा नहीं चलेगा, तब तक योजनाएं सिर्फ फाइलों में ही 'सफल' दिखती रहेंगी।
जन सुझाव / पब्लिक सजेशंस (Public Suggestions)
- आवास योजनाओं का औचक सोशल ऑडिट: राज्य सरकार और जिला प्रशासन को प्रत्येक ब्लॉक में एक स्वतंत्र टीम भेजकर अबुआ और पीएम आवास के लाभार्थियों का 'गुप्त सोशल ऑडिट' कराना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि उनसे किस स्तर पर पैसे मांगे गए।
- जियो-टैगिंग प्रक्रिया का सरलीकरण: रोजगार सेवक द्वारा की जाने वाली जियो-टैगिंग में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक ऐसा मोबाइल ऐप पब्लिक डोमेन में लाया जाए, जिससे खुद लाभार्थी या गांव का कोई भी युवक बिना किसी सरकारी बाबू की निर्भरता के फोटो अपलोड कर सके।
- सख्त निगरानी और वित्तीय साक्षरता: बैंकों और प्रज्ञा केंद्रों (CSC) पर विशेष नजर रखी जाए, जहां अंगूठा लगवाकर या पहचान पत्रों के माध्यम से गरीबों के खातों से पैसे निकाले जाते हैं। बिना खाताधारक की स्पष्ट सहमति और मोबाइल ओटीपी/सत्यापन के बड़ी नकद निकासी पर रोक लगे।
- ब्लॉक स्तर पर शिकायत निवारण प्रकोष्ठ: प्रत्येक अनुमंडल और ब्लॉक कार्यालय में एक 'एंटी-करप्शन कंप्लेंट बॉक्स' और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, जिसकी सीधी मॉनिटरिंग जिला उपायुक्त (DC) कार्यालय द्वारा की जाए।

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