हजारीबाग में भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर झामुमो ने किया नमन: पुराना बस स्टैंड चौक पर प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दी भावभीनी श्रद्धांजलि
"जल, जंगल, जमीन की रक्षा और शोषितों के हक के लिए उलगुलान की अलख जगाने वाले 'धरती आबा' के सिद्धांतों पर चलने का झामुमो नेताओं और कार्यकर्ताओं ने लिया संकल्प"— सांगठनिक प्रभाग
विशेष संवाददाता, हजारीबाग
रिपोर्टर: नरेश सोनी (Editor-in-Chief, News Prahari)
समाचार स्रोत (Source): जिला सांगठनिक प्रभाग, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), हजारीबाग
हजारीबाग: झारखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी, जल, जंगल और जमीन की अस्मिता के रक्षक 'धरती आबा' भगवान बिरसा मुंडा के पावन शहादत दिवस के अवसर पर मंगलवार को हजारीबाग जिला झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) परिवार द्वारा एक भव्य और गरिमामयी श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हजारीबाग शहर के पुराना बस स्टैंड के निकट स्थित भगवान बिरसा मुंडा चौक पर आयोजित इस कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान सभी ने भगवान बिरसा मुंडा की आदमकद प्रतिमा पर श्रद्धापूर्वक माल्यार्पण व पुष्प अर्पित कर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके द्वारा दिखाए गए सामाजिक न्याय व उलगुलान के मार्ग पर चलने का सामूहिक संकल्प लिया।
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| 📝 विचारों की प्रासंगिकता: झामुमो नेताओं का बड़ा बयान— जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए बिरसा मुंडा का खड़ा किया गया आंदोलन आज भी प्रासंगिक; शोषितों के हक की लड़ाई रहेगी जारी। |
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए झामुमो के केंद्रीय सदस्य विकास राणा ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के लिए वीरता, राष्ट्रवाद और प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत हैं। उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत और महाजनी व्यवस्था के खिलाफ आदिवासियों, वंचितों, पिछड़ों और शोषित समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका अल्पकालिक लेकिन ऐतिहासिक जीवन साहस, अभूतपूर्व त्याग और सामाजिक समानता का जीवंत प्रतीक है। आज के युवाओं को उनके महान संघर्ष, अडिग सिद्धांतों और विचारों को गहराई से समझकर अपने जीवन में आत्मसात करने की अत्यधिक आवश्यकता है।
जल, जंगल, जमीन की रक्षा का आंदोलन आज भी प्रासंगिक: कुणाल यादव
वहीं, झामुमो के जिला प्रवक्ता कुणाल यादव ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए जो उलगुलान (क्रांति) खड़ा किया था, उसकी गूंज और प्रासंगिकता आज के आधुनिक दौर में भी उतनी ही प्रभावी है। बिरसा मुंडा का मुख्य सपना एक ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना था, जहां समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी पूरा सम्मान, बुनियादी अधिकार और तरक्की के समान अवसर प्राप्त हो सकें। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान, गौरवशाली इतिहास और अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने में उनके योगदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। झामुमो हमेशा भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाने तथा झारखंडी हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।
अंतिम व्यक्ति तक बिरसा के विचारों को पहुंचाने का संकल्प, झामुमो के कई दिग्गज रहे मौजूद
श्रद्धांजलि सभा के दौरान उपस्थित सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भगवान बिरसा मुंडा के अत्यंत संघर्षमय जीवन, उनके चमत्कारी नेतृत्व और देश की आजादी के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को याद किया। इसके साथ ही, पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके क्रांतिकारी विचारों और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के प्रति चेतना को समाज के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का दृढ़ संकल्प दोहराया।
इस महत्वपूर्ण और गरिमामयी शहादत दिवस कार्यक्रम के अवसर पर मुख्य रूप से झामुमो के नगर अध्यक्ष नवीन प्रकाश, नगर सचिव निसार अहमद, नगर उपाध्यक्ष राजीव वर्मा, जिला सह सचिव अब्दुल्ला खां, पिंकू, विक्रम रवि, संदीप कुमार, मोहम्मद शमसाद, विवेक राणा, मोहम्मद मोइनुद्दीन, अभितेष कुमार, राजेश यादव, रोहित रजक समेत कई अन्य सक्रिय कार्यकर्ता और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।
📋 न्यूज़ प्रहरी एडमिनिस्ट्रेटिव गाइड (Birsa Munda's Legacy & Chotanagpur Tenancy Act History)
📌 जानिए क्या था भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act)?
उलगुलान (The Great Tumult): 1895 से 1900 के बीच भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में मुंडा आदिवासियों द्वारा अंग्रेजों और दिकुओं (बाहरी शोषकों) के खिलाफ किया गया यह झारखंड का सबसे बड़ा और प्रभावी सशस्त्र विद्रोह था। इसका उद्देश्य स्वतंत्र 'मुंडा राज' की स्थापना करना और पारंपरिक भूमि व्यवस्था को बहाल करना था।
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (CNT Act): भगवान बिरसा मुंडा के इसी ऐतिहासिक आंदोलन और शहादत के दबाव में आकर ब्रिटिश सरकार को 11 नवंबर 1908 को सीएनटी एक्ट (CNT Act) लागू करना पड़ा था। यह कानून आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों द्वारा अवैध रूप से हड़पने से रोकने के लिए बनाया गया सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है, जो आज भी झारखंड की भूमि नीति का मुख्य आधार है।
9 जून 1900 (रांची जेल में शहादत): अंग्रेजों द्वारा चक्रधरपुर के जंगलों से धोखे से गिरफ्तार किए जाने के बाद, मात्र 25 वर्ष की आयु में रांची जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों (अंग्रेजों के अनुसार हैजा) के कारण भगवान बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गई थी, जिसे पूरा देश शहादत दिवस के रूप में मनाता है।
🔍 संपादकीय विश्लेषण: बिरसा के सपनों का झारखंड और वर्तमान राजनीति की चुनौतियां (Editorial)
शहादत दिवस पर माल्यार्पण से आगे बढ़कर उनके जल, जंगल, जमीन के सिद्धांतों को धरातल पर उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) द्वारा हजारीबाग में भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर आयोजित यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम न केवल एक राजनीतिक औपचारिकता है, बल्कि यह झारखंड के वैचारिक मूल को याद करने का दिन है। विकास राणा और कुणाल यादव के वक्तव्य इस बात की तस्दीक करते हैं कि बिरसा मुंडा का आंदोलन सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन की मुकम्मल सुरक्षा के लिए था। आज जब झारखंड गठन के ढाई दशक पूरे होने वाले हैं, तब हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या 'धरती आबा' के सपनों का समाज सचमुच बन पाया है? वर्तमान समय में भी कॉर्पोरेट शक्तियों और विस्थापन के कारण झारखंड के सुदूरवर्ती अंचलों में आदिवासियों और मूलवासियों की जमीन पर संकट मंडराता रहता है। ऐसे में झामुमो जैसी क्षेत्रीय पार्टी, जो खुद को जल-जंगल-जमीन की रक्षक मानती है, उस पर यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वह बिरसा मुंडा के सिद्धांतों को केवल भाषणों और माल्यार्पण तक सीमित न रखे। वास्तविक श्रद्धांजलि तभी होगी जब राज्य के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अधिकार पहुंचेंगे और सीएनटी व एसपीटी एक्ट जैसे भूमि सुरक्षा कानूनों का कड़ाई से पालन होगा। युवाओं को बिरसा के विचारों से जोड़ना आज इसलिए जरूरी है ताकि वे अपनी माटी और संस्कृति के प्रति सजग रह सकें।

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