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Editor: Naresh Prasad Soni
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हजारीबाग: शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज पहुंचे पूर्व सदर प्रत्याशी मुन्ना सिंह; अस्पताल अधीक्षक से वार्ता के बाद खत्म हुई वार्ड बॉयों की हड़ताल, उठाया महीनों से रुके वेतन का मुद्दा

हजारीबाग मेडिकल कॉलेज में मुन्ना सिंह के प्रयास से वार्ड बॉयों की हड़ताल खत्म। आउटसोर्सिंग कर्मियों के 9 माह के लंबित वेतन का मामला उठाया।
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अस्पताल में प्रशासनिक अव्यवस्था पर मुन्ना सिंह का कड़ा रुख: नर्स, गार्ड, ऑपरेटर और वार्ड बॉयों के लंबित मानदेय पर सीधे स्वास्थ्य मंत्री से करेंगे बात

"दिन-रात मरीजों की सेवा करने वाले आउटसोर्सिंग कर्मियों का लंबित वेतन और सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता"— मुन्ना सिंह

विशेष संवाददाता, हजारीबाग

हजारीबाग जिले के सदर विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी मुन्ना सिंह ने शुक्रवार को शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने अस्पताल में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं तथा वहां कार्यरत विभिन्न श्रेणी के कर्मचारियों की गंभीर समस्याओं का विस्तृत जायजा लिया। दौरे के क्रम में उन्होंने अस्पताल अधीक्षक डॉ. के.के. सिंह से मुलाकात की और अस्पताल में व्याप्त कमियों, मरीजों को हो रही परेशानियों और चिकित्सा सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक कदमों पर विस्तार से चर्चा की।

📝 बिना वेतन के काम करने को मजबूर कर्मचारी: वार्ड बॉय को 9 महीने, सुरक्षा गार्डों को 7 महीने, कंप्यूटर ऑपरेटरों को 5 महीने और नर्सों को 2 महीने से मानदेय का इंतजार।

​मुन्ना सिंह ने कहा कि यह मेडिकल कॉलेज प्रतिदिन हजारों गरीब, जरूरतमंद और दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले मरीजों की उम्मीदों का मुख्य केंद्र है। ऐसे में अस्पताल की आंतरिक व्यवस्थाएं दुरुस्त रहना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अस्पताल परिसर में मौजूद विभिन्न प्रशासनिक व बुनियादी समस्याओं को शीघ्र दूर कर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी और जनोन्मुखी बनाने पर जोर दिया। वार्ता के दौरान अस्पताल अधीक्षक डॉ. के.के. सिंह ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि जिन समस्याओं की तत्कालिक जानकारी उन्हें मिली थी, उनमें से कई का तत्काल समाधान कर दिया गया है तथा अन्य प्रशासनिक विसंगतियों के निराकरण के लिए आवश्यक विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

मुन्ना सिंह की पहल पर ट्रॉमा सेंटर के वार्ड बॉयों ने खत्म की हड़ताल

​विगत गुरुवार की रात ट्रॉमा सेंटर में एक मरीज के परिजनों और अस्पताल कर्मचारियों के बीच हुए विवाद एवं मारपीट की घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था से नाराज वार्ड बॉय आक्रोशित होकर हड़ताल पर चले गए थे। हड़ताल के कारण अस्पताल की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा था और सुदूर क्षेत्रों से आए मरीजों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।


📝 बिना वेतन के काम करने को मजबूर कर्मचारी: वार्ड बॉय को 9 महीने, सुरक्षा गार्डों को 7 महीने, कंप्यूटर ऑपरेटरों को 5 महीने और नर्सों को 2 महीने से मानदेय का इंतजार।


​मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व प्रत्याशी मुन्ना सिंह सीधे ट्रॉमा सेंटर पहुंचे और आंदोलित कर्मचारियों के बीच बैठकर उनकी समस्याओं और नाराजगी के कारणों को सुना। कर्मचारियों ने बताया कि ड्यूटी के दौरान उन्हें कई बार हिंसक और असुरक्षित परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन स्थानीय प्रबंधन द्वारा उनकी सुरक्षा पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। मुन्ना सिंह ने कर्मचारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि अस्पताल में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है और उनकी सुरक्षा तथा सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उनके इस ठोस आश्वासन के बाद सभी वार्ड बॉयों ने अपनी हड़ताल समाप्त करने का निर्णय लिया और पुनः कार्य पर लौट आए, जिससे अस्पताल की आपातकालीन सेवाएं सामान्य हो सकीं।

आउटसोर्सिंग कर्मियों का फूटा दर्द: नौ महीने तक का मानदेय लंबित

​निरीक्षण के दौरान अस्पताल में कार्यरत संविदा नर्सों, वार्ड बॉयों, सुरक्षा गार्डों तथा कंप्यूटर ऑपरेटरों ने अपनी गंभीर आर्थिक समस्याएं मुन्ना सिंह के समक्ष रखीं। कर्मचारियों ने बताया कि कई महीनों से वेतन भुगतान नहीं होने के कारण उनके परिवारों के सामने भुखमरी और गंभीर आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

​वेतन विसंगति की जानकारी देते हुए पीड़ित कर्मचारियों ने बताया कि अस्पताल में अलग-अलग पदों पर तैनात कर्मियों का मानदेय लंबे समय से बकाया है। व्यवस्था की नाक के नीचे काम कर रहे वार्ड बॉयों का पिछले नौ महीने से वेतन लंबित है। वहीं, रात-दिन सुरक्षा में तैनात रहने वाले सुरक्षा गार्डों को सात महीने से मानदेय नहीं मिला है। इसके अलावा, अस्पताल के तकनीकी कार्यों को संभालने वाले कंप्यूटर ऑपरेटरों का पांच महीने और मरीजों की तीमारदारी में जुटीं संविदा नर्सों का दो महीने का वेतन बकाया है। कर्मचारियों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि वे सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों में लगातार मरीजों की सेवा कर रहे हैं, लेकिन मानदेय न मिलने से घर का खर्च चलाना, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना उनके लिए असंभव होता जा रहा है।

उच्च स्तरीय स्तर पर उठेगा मुद्दा: मुन्ना सिंह

​पूर्व प्रत्याशी ने अस्पताल अधीक्षक से स्पष्ट कहा कि जो कर्मचारी दिन-रात अस्पताल में रहकर मरीजों की सेवा कर रहे हैं, उन्हें समय पर वेतन और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिलना चाहिए। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस गंभीर मुद्दे को लेकर आउटसोर्सिंग कंपनी के संचालकों, स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों तथा स्वास्थ्य मंत्री से वार्ता कर सभी लंबित वेतन का भुगतान जल्द कराने का प्रयास करेंगे।

​उन्होंने आगे कहा कि महागठबंधन की सरकार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी के नेतृत्व में राज्य के विकास तथा स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए 24 घंटे कार्य कर रही है। सरकार की प्राथमिकता है कि राज्य के अंतिम व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचें, जिसके लिए वे धरातल पर लगातार संघर्ष जारी रखेंगे।

📋 न्यूज़ प्रहरी एडमिनिस्ट्रेटिव गाइड (Labor Laws & Outsourcing Context)

​📌 आउटसोर्सिंग और मानदेय: जानिए क्या हैं श्रम कानून और स्वास्थ्य कर्मियों के अधिकार?

  • पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट: भारतीय श्रम कानून के अनुसार, किसी भी संस्थान या आउटसोर्सिंग एजेंसी को अपने कर्मचारियों को प्रत्येक महीने की निश्चित तारीख के भीतर वेतन देना अनिवार्य है। महीनों तक वेतन रोकना सीधे तौर पर श्रम अधिकारों का उल्लंघन है।
  • कार्यस्थल पर सुरक्षा: मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत सरकारी अस्पतालों में ऑन-ड्यूटी स्वास्थ्य कर्मियों, डॉक्टरों या पैरामेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट करना एक गैर-जमानती अपराध है, जिसमें कानूनी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
  • स्थानीय आकस्मिक निधि: सरकारी मेडिकल कॉलेजों में स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं को सुचारू रखने के लिए रोगी कल्याण समिति और आकस्मिक निधि का प्रावधान होता है, जिससे आपातकालीन स्थितियों में आवश्यक मानव संसाधन को प्रबंधित किया जा सकता है।

🔍 संपादकीय विश्लेषण: स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ की उपेक्षा कब तक? (Editorial)

वेतन संकट और असुरक्षा के बीच झूलता हजारीबाग का सबसे बड़ा मेडिकल कॉलेज

शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामने आई यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि उस आउटसोर्सिंग व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है जिसके भरोसे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को छोड़ दिया गया है। जो वार्ड बॉय, नर्स और सुरक्षा गार्ड चौबीसों घंटे संक्रमित और तनावपूर्ण माहौल में मरीजों की तीमारदारी करते हैं, उन्हें नौ-नौ महीने तक वेतन न देना अमानवीयता की श्रेणी में आता है।

पूर्व प्रत्याशी मुन्ना सिंह का इस संवेदनशील समय में अस्पताल का दौरा करना और कर्मचारियों के बीच बैठकर सीधे संवाद के जरिए हड़ताल को समाप्त करवाना एक परिपक्व और जनहितैषी नेतृत्व को दर्शाता है। यदि यह हड़ताल लंबी खींचती, तो पूरा सदर क्षेत्र चिकित्सा के अभाव में कराह उठता। परंतु, असली सवाल अब भी जस का तस है— क्या स्थानीय प्रशासन और आउटसोर्सिंग कंपनियां तब तक नहीं जागेंगी जब तक कर्मचारी सड़कों पर न उतर आएं? स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और विभाग के आला अधिकारियों को हजारीबाग मेडिकल कॉलेज के इस गंभीर वेतन संकट का स्थाई समाधान निकालना होगा, अन्यथा ऐसी हड़तालें बार-बार स्वास्थ्य व्यवस्था को वेंटिलेटर पर लाती रहेंगी।

  • रिपोर्टर: नरेश सोनी (Editor-in-Chief, News Prahari)
  • समाचार स्रोत (Source): विक्की धान की कलम से शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल परिसर, हजारीबाग सदर.


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