Hazaribagh News: विष्णुगढ़ हत्याकांड में कानूनी घेराबंदी तेज़, झारखंड स्टेट बार काउंसिल के सदस्य ने SP को लिखा पत्र
हजारीबाग: झारखंड के हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ थाना क्षेत्र में 12 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई बर्बरता और हत्या के मामले में अब कानूनी जगत ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। इस जघन्य अपराध को लेकर झारखंड राज्य विधिज्ञ परिषद् (Jharkhand State Bar Council) के निर्वाचित सदस्य और झारखंड हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत कुमार शिकारवार ने हजारीबाग पुलिस अधीक्षक (SP) को एक औपचारिक पत्र लिखकर मामले में त्वरित कार्रवाई और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
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| झारखंड स्टेट बार काउंसिल के सदस्य अधिवक्ता हेमंत कुमार शिकारवार द्वारा हजारीबाग SP को भेजा गया आधिकारिक पत्र, जिसमें विष्णुगढ़ मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की गई है। |
कानूनी प्रावधानों और नई धाराओं पर जोर
अधिवक्ता हेमंत कुमार शिकारवार ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि यह मामला केवल एक सामान्य अपराध नहीं, बल्कि मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है। उन्होंने मांग की है कि FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 65(2) को कड़ाई से लागू किया जाए।
बता दें कि इस नई धारा के तहत 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, हत्या के लिए धारा 103(1) और POCSO एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप पत्र दाखिल करने का आग्रह किया गया है।
गवाहों की सुरक्षा: 'विटनेस प्रोटेक्शन स्कीम' की मांग
पत्र में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु गवाहों और पीड़िता के परिवार की सुरक्षा को लेकर उठाया गया है। अधिवक्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 398 का हवाला देते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई है। उन्होंने मांग की है कि:
पीड़ित परिवार और मुख्य गवाहों को 'कैटेगरी A' (जीवन को खतरा) के तहत सुरक्षा प्रदान की जाए।
जांच के दौरान गवाहों की गोपनीयता बरकरार रखी जाए ताकि स्थानीय प्रभाव या दबाव में आकर वे अपने बयानों से न भटकें।
BNSS की धारा 176(1) के तहत पीड़ित परिवार के बयानों की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी कराई जाए।
फॉरेंसिक साक्ष्य और डिजिटल फुटप्रिंट्स
अधिवक्ता ने पुलिस को तकनीकी रूप से भी सचेत किया है। पत्र के माध्यम से मांग की गई है कि घटनास्थल से मिले साक्ष्यों, जैसे कि पत्थर (जिससे साक्ष्य मिटाने की कोशिश की गई) और अन्य फॉरेंसिक नमूनों की 'चेन ऑफ कस्टडी' को पूरी शुद्धता के साथ बनाए रखा जाए। साथ ही, 24-25 मार्च की रात के डिजिटल फुटप्रिंट्स और स्थानीय CCTV फुटेज को तुरंत सुरक्षित करने का आग्रह किया गया है ताकि अपराधी किसी भी तकनीकी खामी का लाभ न उठा सकें।
60 दिनों के भीतर चार्जशीट की समयसीमा
हजारीबाग बार एसोसिएशन और कानूनी समुदाय इस मामले की बारीकी से निगरानी कर रहा है। अधिवक्ता शिकारवार ने मांग की है कि 60 दिनों के भीतर जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की जाए, ताकि मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) में हो सके। उनका कहना है कि प्रक्रियागत देरी अक्सर न्याय की राह में बाधा बनती है, जिसे इस मामले में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
निष्कर्ष और सामाजिक चिंता
विष्णुगढ़ की इस घटना ने पूरे झारखंड को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहां समाज में आक्रोश है, वहीं कानूनी विशेषज्ञों की यह सक्रियता यह सुनिश्चित करेगी कि अपराधी कानून के शिकंजे से बच न सकें। अब सबकी निगाहें हजारीबाग पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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