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Editor: Naresh Prasad Soni
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विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में जल संवेदीकरण कार्यशाला 'जल और लैंगिक समानता' पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

विभावि हजारीबाग में विश्व जल दिवस पर कार्यशाला आयोजित। जल और लैंगिक समानता थीम पर विशेषज्ञों ने जल संरक्षण और जल बजट की आवश्यकता पर दिया जोर।
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विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में जल संवेदीकरण कार्यशाला 'जल और लैंगिक समानता' पर विशेषज्ञों ने दिया जोर
विनोबा भावे विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में जल शपथ लेते प्राध्यापक एवं विद्यार्थी। 

हजारीबाग: विनोबा भावे विश्वविद्यालय (VBU) के राजनीति विज्ञान विभाग में विश्व जल दिवस 2026 पखवाड़े के तहत एक महत्वपूर्ण 'जल संवेदीकरण कार्यशाला' (Water Sensitization Workshop) का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से न केवल जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों पर चर्चा हुई, बल्कि जल संकट का महिलाओं के जीवन पर पड़ने वाले गहरे प्रभाव को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया।

जल संरक्षण: वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता

कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जल का दुरुपयोग रोकना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए अनिवार्य संकल्प बन चुका है। उन्होंने भारत के 'वाटरमैन' राजेंद्र सिंह की उपलब्धियों का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे सामुदायिक प्रयासों से सूखी नदियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे आज से ही अपने दैनिक जीवन में जल की एक-एक बूंद बचाने का संकल्प लें।

विश्व जल दिवस 2026: जल और लैंगिक समानता (Water & Gender Equality)

विषय प्रवेश करते हुए डॉ. अजय बहादुर सिंह ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने 1993 में विश्व जल दिवस की शुरुआत मीठे जल के संरक्षण के उद्देश्य से की थी। इस वर्ष (2026) की थीम "जल और लैंगिक समानता" और नारा "जहाँ पानी बहता है, वहाँ समानता पनपती है" रखा गया है। यह विषय इस बात को दर्शाता है कि पानी की उपलब्धता का सीधा संबंध सामाजिक न्याय और समानता से है।

जल संकट और नारी शक्ति का अंतर्संबंध

मुख्य वक्ता विकास कुमार यादव ने यूनेस्को (UNESCO) के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक चौंकाने वाला तथ्य साझा किया। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में पानी की व्यवस्था करने की 80% जिम्मेदारी महिलाओं और बच्चियों पर है। जब जल संकट गहराता है, तो इसका सबसे बुरा असर महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि "जल शक्ति ही नारी शक्ति है।"

इसके साथ ही उन्होंने भारत सरकार के 'जल शक्ति मंत्रालय' की योजनाओं जैसे 'जल जीवन मिशन' और झारखंड सरकार की 'जल सहिया योजना' एवं 'नीलांबर-पीतांबर जल समृद्धि योजना' की विस्तृत जानकारी दी, जो ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रबंधन को सशक्त बना रही हैं।

'जल कंगाली' की ओर बढ़ती दुनिया: एक चेतावनी

विशिष्ट वक्ता प्रतीक कुमार ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से वैश्विक जल स्थिति का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 3% ही मीठा पानी (Fresh Water) है, जिसका अधिकांश भाग ग्लेशियरों या भूजल के रूप में है। उन्होंने 'जल संकट' को 'जल कंगाली' (Water Bankruptcy) की संज्ञा देते हुए कहा कि यह संकट प्राकृतिक कम और मानव जनित (Anthropogenic) अधिक है। उन्होंने सुझाव दिया कि जैसे हम अपनी आय का बजट बनाते हैं, वैसे ही अब हर पंचायत और शहर को 'जल बजट' तैयार करने की आवश्यकता है।

जल शपथ और युवाओं की भागीदारी

कार्यक्रम के समापन सत्र में रवि कुमार विश्वकर्मा ने सभी उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को 'राष्ट्रीय जल मिशन' द्वारा निर्धारित 'जल शपथ' दिलाई। कार्यशाला में छात्रा प्रीति कुमारी और पिंटू रजक ने भी अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर विभाग के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे, जिन्होंने इस वैश्विक समस्या के समाधान में अपनी भूमिका निभाने का भरोसा दिया।


न्यूज़ प्रहरी प्रधान सम्पादक नरेश सोनी।

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