विनोबा भावे विश्वविद्यालय: राजनीति विज्ञान विभाग में डॉ. अंबेडकर जयंती पर संगोष्ठी, विशेषज्ञों ने बताया आधुनिक भारत का निर्माता
समानता के बिना स्वतंत्रता अधूरी, महिलाओं की प्रगति और सामाजिक न्याय पर बाबासाहेब के विचारों पर हुई गहन चर्चा।
हजारीबाग: विनोबा भावे विश्वविद्यालय (VBU) के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग में बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की जन्म जयंती की पूर्व संध्या पर एक गरिमामय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से न केवल बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी गई, बल्कि उनके लोकतांत्रिक और सामाजिक विचारों की प्रासंगिकता पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ. सुकल्याण मोइत्रा ने की।
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| समानता के बिना स्वतंत्रता अधूरी, प्रधानाचार्य डॉक्टर अजय बहादुर सिंह । मानता और धर्म पर बाबासाहेब के विचार |
बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए डॉ. अजय बहादुर सिंह ने बाबा साहेब के दर्शन को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि "समानता के बिना स्वतंत्रता निरर्थक है।" उन्होंने धार्मिक कट्टरता पर प्रहार करते हुए कहा था कि धर्म मनुष्य के लिए बना है, न कि मनुष्य धर्म के लिए। सच्चा धर्म वही है जो व्यक्ति के भीतर स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना पैदा करे। डॉ. सिंह ने उनके प्रसिद्ध कथन को दोहराते हुए कहा कि जीवन लंबा नहीं, बल्कि महान होना चाहिए।
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| महिलाओं की प्रगति और सामाजिक न्याय पर बाबासाहेब के विचारों पर हुई गहन चर्चा। |
विशिष्ट वक्ता श्वेता कुमारी ने बाबा साहेब को आधुनिक भारत का निर्माता बताया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने 60 से अधिक देशों के संविधानों का अध्ययन कर भारत को एक ऐसा मजबूत तंत्र दिया, जहाँ 'एक व्यक्ति, एक मत' का सिद्धांत लागू हुआ। उन्होंने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने की वकालत की और स्पष्ट किया कि समाज की प्रगति तभी पूर्ण मानी जाएगी जब महिलाओं की प्रगति होगी।
ऐतिहासिक योगदान और व्यक्तित्व
इनामुल अंसारी ने विद्यार्थियों को बाबा साहेब की जीवन यात्रा और उनकी लिखी पुस्तकों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भागीदारी और प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है। वहीं, वक्ता सौरभ कुमार ने सामाजिक न्याय और भेदभाव के विरुद्ध बाबा साहेब के संघर्षों पर प्रकाश डाला, जबकि महेंद्र पंडित ने 'नवयाना' बौद्ध धर्म के माध्यम से उनके आध्यात्मिक बदलाव पर चर्चा की।
अंबेडकर और गांधी: वैचारिक विमर्श
प्रतीक कुमार ने महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के बीच के वैचारिक संबंधों की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि यद्यपि दोनों का लक्ष्य समाज कल्याण था, किंतु जाति व्यवस्था और पृथक निर्वाचन जैसे मुद्दों पर उनके मार्ग भिन्न थे। जहाँ गांधी वर्ण व्यवस्था में सुधार चाहते थे, वहीं अंबेडकर जाति व्यवस्था के समूल नाश के पक्षधर थे।
निष्कर्ष
कार्यक्रम का संचालन धर्मेंद्र कुमार ने किया। इस संगोष्ठी में विभाग के शोधार्थियों और प्रथम एवं चतुर्थ सत्र के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस आयोजन ने छात्रों को बाबा साहेब के संविधानिक मूल्यों और उनके सामाजिक लक्ष्यों को गहराई से समझने का अवसर प्रदान किया।


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