दृष्टिकोण: सोनम वांगचुक का अनशन और बिखरता विपक्ष; क्या आंदोलनों को रोकने में सफल रही सरकार?
राजनीतिक विश्लेषण (News Prahari Desk): देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देशव्यापी चर्चाओं के केंद्र में है। संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले लद्दाख की मांगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को धरना स्थल से अचानक उठाए जाने के बाद कई गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े हो गए हैं। यह कार्रवाई सिर्फ जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है; बल्कि इसके समानांतर मध्य प्रदेश के छतरपुर में महीनों से संघर्षरत आदिवासियों और ऋषिकेश में पर्यावरण संरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं पर हुई कार्रवाई भी सरकार की सख्त मंशा को साफ करती है।
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| Political Analysis: सोनम वांगचुक को क्यों हटाया? जंतर-मंतर के आंदोलन की कड़वी सच्चाई! |
सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर वरिष्ठ विश्लेषक विनोद (झारखंड) द्वारा साझा किए गए इन विचारों के आलोक में आइए समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की राजनीतिक क्रोनोलॉजी, विपक्ष के अंतर्विरोधों और लोकतांत्रिक आंदोलनों की जमीनी हकीकत का एक विस्तृत विश्लेषण:
जन-आक्रोश को दबाने की अपार शक्ति और रणनीतिक छूट
संसद मार्च से पहले पुलिस प्रशासन द्वारा प्रदर्शन की अनुमति न देना यह साफ करता है कि सरकार किसी भी बड़े प्रतिरोध को रोकने के लिए अपनी अपार शक्ति का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकिचा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जंतर-मंतर पर हाल के दिनों में जो थोड़ी बहुत रियायत दी गई थी, वह शायद इसलिए थी ताकि हालिया विवादों से उपजा जन-आक्रोश शांतिपूर्वक बाहर निकल जाए।
सोनम वांगचुक के अनशन और जंतर-मंतर की गहमा-गहमी के बीच कई बड़े अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव, अमेरिका के साथ हुए समझौते, सांसदों की कथित खरीद-फरोख्त और आंतरिक भ्रष्टाचार के आरोपों से जनता का ध्यान भटकाने में सरकार एक सीमा तक सफल रही है। इसके साथ ही, विपक्ष के बीच आंतरिक मतभेदों को हवा देने की कोशिशें भी रंग लाती दिख रही हैं।
आंदोलनों का चेहरा: 'कॉकरोच पार्टियों' की कमजोरी बनाम वामदलों का जनाधार
इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की लोकप्रियता के दम पर खड़ी होने वाली तथाकथित 'कॉकरोच पार्टियों' (क्षणभंगुर राजनीतिक दलों) की आंतरिक कमजोरी को भी उजागर किया है। इन दलों में सरकार के दमनकारी चक्रव्यूह का मुकाबला करने की सांगठनिक शक्ति दिखाई नहीं देती।
दूसरी ओर, आंदोलन में शामिल वामपंथी दलों का संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है। भले ही वे आज चुनावी राजनीति में एक बड़ी शक्ति न हों, लेकिन उनका एक समर्पित जनाधार है। यही कारण है कि जंतर-मंतर के प्रतिरोध में जो भी प्रतिबद्धता दिख रही है, वह मुख्य रूप से इन्हीं कैडर्स और उनके छात्र संगठनों के कारण है, अन्यथा वहां सन्नाटा पसरा होता।
'सहानुभूति' की राजनीति और हाशिए पर पड़े दलों की सक्रियता
सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का नैतिक दबाव राजनीतिक दलों पर जरूर पड़ा, लेकिन एनडीए (NDA) के घटक दलों की ओर से इस पर पूरी तरह चुप्पी साधी गई। चौतरफा दबाव के बाद कांग्रेस ने अपने प्रवक्ताओं को मैदान में उतारा, समाजवादी पार्टी और राजद के सांसदों ने भी हाजिरी लगाई।
लेकिन यदि गहराई से गौर किया जाए, तो इस आंदोलन में सबसे ज्यादा सक्रियता उन दलों ने दिखाई है जो हाल के दिनों में राजनीतिक रूप से हाशिए पर चले गए हैं:
अरविंद केजरीवाल (AAP): राजनीतिक मानचित्र पर अपनी खोई हुई जमीन तलाशने के लिए उन्हें अपनी छवि चमकाने का यह एक नया अवसर मिला है।
उद्धव ठाकरे (शिवसेना): महाराष्ट्र की तर्ज पर दिल्ली के इस मंच का उपयोग अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए कर रहे हैं।
दलित राजनीति: युवा नेता चंद्रशेखर इस दौरान सक्रिय जरूर दिखे, लेकिन व्यापक समाज और समूचे दलित वोट बैंक पर उनका गहरा असर फिलहाल नहीं दिखता, क्योंकि इस वर्ग की कमान अभी भी पारंपरिक रूप से मायावती और बिहार में चिराग पासवान जैसे नेताओं के हाथों में केंद्रित है।
न्यायपालिका की भूमिका और प्रशासनिक घेराबंदी
इस पूरे मामले में सरकार ने न्यायपालिका के निर्देशों का भी बेहद चतुराई से इस्तेमाल किया। कोर्ट ने जब सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर नजर रखने की बात कही, तो प्रशासन ने उनके गिरते स्वास्थ्य का आकलन कर उन्हें तुरंत धरना स्थल से हटाकर अस्पताल पहुंचा दिया। प्रबुद्ध समाज भी यही अपील कर रहा था कि वे अनशन तोड़ दें, जिसे सरकार ने अपने तरीके से अमलीजामा पहना दिया।
अब जब उन्हें अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने के लिए मुक्त करने की मांग की जा रही है, तो दिल्ली हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है और मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट से सरकार की इच्छा के विपरीत किसी बड़े फैसले की उम्मीद कम ही दिखाई देती है। जंतर-मंतर पर सुरक्षा का घेरा इतना अभेद्य बना दिया गया है कि बिना किसी बड़े टकराव के प्रतिरोध मार्च निकालना लगभग असंभव हो चुका है।
अंतिम निष्कर्ष: एकजुटता के बिना चुनावी जंग अधूरी
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यदि इस सत्ता तंत्र और स्थापित राजनीतिक ढांचे का मुकाबला करना है, तो उसका एकमात्र रास्ता चुनावी जंग में शिकस्त देना ही है। लेकिन इसके लिए संपूर्ण विपक्ष का जिस व्यापक स्तर पर एकजुट होना अनिवार्य है, उसके आसार फिलहाल दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते। यह हकीकत भले ही निराशाजनक लगे, लेकिन आज की वास्तविक राजनीतिक स्थिति यही है।
(इनपुट सोर्स: वरिष्ठ विश्लेषक विनोद (झारखंड) का आधिकारिक फेसबुक पेज)

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