झारखंड विधानसभा में गूँजी 'जल-जंगल-जमीन' की हुंकार: विधायक जयराम महतो ने भूमि अधिग्रहण और आरक्षण पर सरकार को घेरा
Ranchi: झारखंड विधानसभा का बजट सत्र आज उस समय गरमा गया जब डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो ने सदन में राज्य के मूल निवासियों के अस्तित्व, जमीन की लूट और समुदायों के आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। जयराम महतो ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में ऐतिहासिक संदर्भों के साथ वर्तमान सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल दागे। |
जमीन नहीं, आत्मा बसती है खेतों में: जयराम महतो
विधायक महतो ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि झारखंड के लोगों की आत्मा उनकी जमीन और खेतों में बसती है। उन्होंने 1769 के चुहाड़ आंदोलन और रघुनाथ महतो के बलिदान का जिक्र करते हुए कहा कि यहाँ के पूर्वजों ने अंग्रेजों से अपनी माटी बचाने के लिए सैकड़ों लड़ाइयाँ लड़ीं। उन्होंने 1837 के विल्किन्सन कानून, 1908 के CNT एक्ट और 1949 के SPT एक्ट की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि ये कानून झारखंडियों की सुरक्षा के कवच थे, लेकिन आज आज़ाद भारत में इनका उल्लंघन चिंताजनक है।
भूमि अधिग्रहण और मुआवजे पर उठाए गंभीर सवाल
सदन में चर्चा के दौरान जयराम महतो ने देवघर एयरपोर्ट और अन्य परियोजनाओं के लिए हुए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून (धारा 26) के बावजूद, किसानों को बाजार मूल्य (Market Rate) के बजाय पुराने उत्पादन आधारित फॉर्मूले से मुआवजा दिया जा रहा है। उन्होंने दुमका और देवघर के उदाहरण देते हुए कहा कि माननीय उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अधिकारी किसानों का हक मार रहे हैं।
कुड़मी और केवट समाज के आरक्षण की पुरजोर वकालत
जयराम महतो ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कुड़मी (महतो) और केवट (मल्लाह, निषाद) समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि 1872 से 1931 तक की जनगणना में कुड़मी समाज को 'एबोरिजिनल' (Aborigines) माना गया था, लेकिन 1950 में बिना किसी सूचना के उन्हें इस सूची से बाहर कर दिया गया। उन्होंने सरकार से मांग की कि टीआरआई (TRI) से दोबारा एथनोग्राफिक रिपोर्ट तैयार कराकर केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी जाए।
1932 खतियान और स्थानीय नीति पर स्पष्ट रुख
विधायक ने 1932 के खतियान पर आधारित स्थानीय नीति को लेकर सरकार को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि 25 सालों के बाद भी राज्य की अपनी कोई ठोस स्थानीय नीति नहीं है, जिसके कारण बाहरी राज्यों के लोग यहाँ के हक-अधिकारों पर अतिक्रमण कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि "स्थानीयता का मतलब किसी को राज्य से बाहर निकालना नहीं, बल्कि सरकारी सुविधाओं और नौकरियों में राज्य के मूल निवासियों को प्राथमिकता देना है।"
सचिवालय की कार्यशैली और तकनीक पर प्रहार
महतो ने सूचना प्रौद्योगिकी के युग में सरकारी अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जहाँ मुख्यमंत्री सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, वहीं राज्य के अधिकांश सचिव और प्रधान सचिव जनता की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अधिकारियों को भी सोशल मीडिया और तकनीक के माध्यम से जनता से सीधे जुड़ना चाहिए।

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