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Editor: Naresh Prasad Soni
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झारखंड: महिला आयोग की अनुपस्थिति पर अंबा प्रसाद का तीखा प्रहार, जल्द गठन की मांग

अंबा प्रसाद ने झारखंड में महिला आयोग के जल्द गठन की मांग की। उन्होंने कहा कि आयोग के बिना महिलाओं को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। पढ़ें पूरी खब
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झारखंड: महिला आयोग की अनुपस्थिति पर अंबा प्रसाद का तीखा प्रहार, जल्द गठन की मांग

सम्पादकीय 
#Amba Prasad 

रांची: झारखंड की राजनीति में महिलाओं के अधिकारों की आवाज बुलंद करते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय सचिव व पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने राज्य सरकार से जल्द से जल्द राज्य महिला आयोग के गठन की मांग की है। उन्होंने कहा कि आयोग के अस्तित्व में न होने के कारण राज्य की आधी आबादी को अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।

न्याय की आस में भटक रही हैं महिलाएं

अंबा प्रसाद ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय से भी हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिला आयोग केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय का एक सुलभ द्वार है। इसकी अनुपस्थिति में घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और अन्य अपराधों की शिकायतों का निपटारा समय पर नहीं हो पा रहा है।

"जब जनप्रतिनिधि सुरक्षित नहीं, तो आम महिला का क्या?"

अंबा प्रसाद ने अपने संघर्ष का जिक्र करते हुए एक बड़ा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा, "मैं खुद एक महिला जनप्रतिनिधि होने के नाते अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हूँ। जब एक विधायक स्तर की महिला को न्याय पाने में इतनी कठिनाई हो रही है, तो दूर-दराज के गांवों में रहने वाली आम महिलाओं की स्थिति की कल्पना करना भी डरावना है।"

आयोग न होने के गंभीर दुष्परिणाम

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि महिला आयोग के न होने से निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं:

सुनवाई में देरी: पुलिस थानों के चक्कर लगाने के बाद भी महिलाओं को उचित परामर्श और कानूनी सहायता नहीं मिल पाती।

असुरक्षा का माहौल: अपराधियों के मन में डर कम होता है क्योंकि उन्हें पता है कि त्वरित निगरानी करने वाली कोई संस्था सक्रिय नहीं है। 

सरकारी योजनाओं का लाभ: महिलाओं के कल्याण के लिए बनी योजनाओं की मॉनिटरिंग प्रभावित होती है।

झारखंड सहित देश के कई राज्यों में महिला आयोगों के खाली पड़े पद एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय हैं। अंबा प्रसाद की यह मांग न केवल राजनीतिक है, बल्कि मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकार को चाहिए कि वह राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए इस संवैधानिक संस्था को अविलंब पुनर्जीवित करे।

क्या आपको लगता है कि महिला आयोग के बिना न्याय मिलना कठिन है?

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