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Editor: Naresh Prasad Soni
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कन्या पूजन की सात्विकता और असुरक्षित होती आधुनिक देवियां एक कड़वा सामाजिक विश्लेषण

कन्या पूजन की परंपरा और समाज में बेटियों की सुरक्षा के बीच बढ़ते फासले पर एक गहरा विश्लेषण। हजारीबाग की घटना और सामाजिक पतन पर विशेष रिपोर्ट।
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कन्या पूजन की सात्विकता और असुरक्षित होती आधुनिक देवियां एक कड़वा सामाजिक विश्लेषण

HAZARIBAGH: भारतीय संस्कृति में उत्सवों का अपना एक आध्यात्मिक महत्व है और इनमें सबसे प्रमुख है शक्ति की उपासना का पर्व नवरात्रि। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में हम कन्याओं को साक्षात मां जगदंबा का स्वरूप मानकर उनके चरण पखारते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं और उनसे आशीर्वाद मांगते हैं। लेकिन वर्तमान समय में श्रद्धा का यह स्वरूप केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित रह गया है। हकीकत के धरातल पर जब हम नजर डालते हैं, तो तस्वीर बेहद डरावनी और विचलित करने वाली दिखाई देती है। हाल ही में झारखंड के हजारीबाग जिले के अंतर्गत आने वाले विष्णुगढ़ में जो हृदयविदारक घटना घटी, उसने समाज के इस दोहरे चरित्र को पूरी तरह नग्न कर दिया है। एक तरफ पूरा देश भक्ति भाव में डूबा था और दूसरी तरफ एक मासूम बच्ची की अस्मत और उसकी जिंदगी को दरिंदगी के साथ कुचल दिया गया। यह विरोधाभास हमारी सामाजिक प्रगति पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

हजारीबाग के विष्णुगढ़ में हुई जघन्य घटना के बाद न्याय की मांग करता समाज और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर उठते सवाल।

विष्णुगढ़ की वह घटना कोई सामान्य आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे नैतिक पतन की वह पराकाष्ठा है जहाँ मनुष्यता पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। चैत्र नवरात्रि के पवित्र अवसर पर जब हर घर में श्लोक और मंत्र गूंज रहे थे, तब एक बारह वर्ष की मासूम बालिका, जो अपनी मां के साथ उत्सव की खुशियां देखने निकली थी, वह हैवानियत का शिकार हो गई। अपराधी की क्रूरता इस कदर थी कि उसने न केवल बलात्कार जैसा जघन्य अपराध किया, बल्कि पीड़िता की आंखें निकाल लीं और जीभ काट दी। यह कृत्य यह बताने के लिए काफी है कि समाज में कानून का डर खत्म हो चुका है और राक्षसी प्रवृत्तियां हावी हो गई हैं। ऐसी बर्बरता सुनने के बाद यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या हम वास्तव में एक सभ्य समाज में रह रहे हैं? या फिर हमारी धार्मिकता केवल दिखावे का एक आवरण मात्र रह गई है?

इस पूरे प्रकरण में प्रशासन और सरकार की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। लोकतंत्र में जब भी ऐसी कोई वीभत्स घटना होती है, तो जनता की नजरें शासन की ओर उम्मीद से देखती हैं। विपक्षी दलों का सक्रिय होना और पीड़ित परिवार के साथ खड़े होना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की चुप्पी और जिला प्रशासन की संवेदनहीनता घाव पर नमक छिड़कने जैसा काम करती है। पुलिस की जांच अपनी गति से चलती रहती है, परंतु जब तक राज्य का नेतृत्व ऐसे मामलों में सख्त और त्वरित संदेश नहीं देता, तब तक अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते। न्याय में देरी भी एक प्रकार का अन्याय ही है, विशेषकर उन मामलों में जिन्हें 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। पीड़ित परिवार आज न्याय की भीख मांग रहा है, लेकिन सत्ता के गलियारों में पसरी खामोशी कई गंभीर सवाल पैदा कर रही है।

हमें यह समझना होगा कि केवल कठोर कानून बना देने से बेटियां सुरक्षित नहीं होंगी। समस्या हमारी उस मानसिकता में है जो एक तरफ तो पत्थर की मूरत में देवी ढूंढती है, लेकिन सड़क पर चलती जीवित देवी को केवल उपभोग की वस्तु समझती है। यह वैचारिक प्रदूषण हमारे स्कूलों, घरों और समाज के हर कोने में फैल चुका है। जिस घर में कन्या पूजन के नाम पर ढोंग किया जाता है, उसी समाज के कुछ लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। यह हमारे परवरिश के तरीकों और सामाजिक मूल्यों के पतन का ही नतीजा है। क्या हम अपने बच्चों को महिलाओं का सम्मान करना सिखा पा रहे हैं? क्या हमारा न्याय तंत्र इतना प्रभावी है कि एक अपराधी अपराध करने से पहले हजार बार सोचे? हजारीबाग की इस घटना ने इन तमाम सवालों को एक बार फिर से सतह पर ला खड़ा किया है।

आज हर संवेदनशील हृदय में एक आक्रोश है, एक तड़प है और एक मांग है। मांग केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। न्याय तब माना जाएगा जब इन नरपिशाचों को ऐसी सजा मिले जो इतिहास के पन्नों में नजीर बन जाए। समाज को आत्म-मंथन की सख्त जरूरत है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जब तक हम अपने भीतर के भेड़ियों को खत्म नहीं करेंगे, तब तक कोई भी पूजा सफल नहीं होगी। मां जगदंबा की सच्ची भक्ति तभी सार्थक है जब हम हर बेटी को वह सुरक्षा और सम्मान दे सकें जिसकी वह हकदार है। कन्या पूजन केवल नौ दिनों का अनुष्ठान नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।

विष्णुगढ़ की उस मासूम का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। उसका लहू समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे हम कभी नहीं धो पाएंगे, अगर हमने आज भी चुप्पी साधे रखी। अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और समाज अपनी नींद से जागें। हमें एक ऐसा वातावरण निर्मित करना होगा जहाँ बेटियां निडर होकर सांस ले सकें, जहाँ रात के अंधेरे में उन्हें डर न लगे और जहाँ उत्सवों का मतलब केवल रस्म अदायगी न हो। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह इस समाज को वह दृष्टि और विवेक प्रदान करें, जिससे हम अपनी बेटियों की रक्षा कर सकें और उन्हें साक्षात देवी स्वरूप मानकर उनकी गरिमा को अक्षुण्ण रख सकें। जब तक यह बदलाव नहीं आता, तब तक हर साल आने वाली नवमी और हर साल होने वाला कन्या पूजन हमारी नैतिकता पर एक व्यंग्य ही बना रहेगा।

Naresh Soni Editor in chief 

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