इचाक में गूंजी महान सम्राट अशोक की गौरव गाथा: 2317वीं जयंती पर विरासत बचाने का संकल्प
HAZARIBAGH: झारखंड के हजारीबाग जिला अंतर्गत इचाक प्रखंड में इतिहास के पन्नों को एक बार फिर जीवंत किया गया। अवसर था अखंड भारत के निर्माता और शांति व अहिंसा के अग्रदूत महान सम्राट अशोक की 2317वीं जयंती का। महावीर मेहता कार्यालय में आयोजित इस गरिमामयी समारोह में न केवल सम्राट
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| Samrat Ashok Jayanti Ichak |
अशोक को याद किया गया, बल्कि उनके आदर्शों को आधुनिक समाज में प्रासंगिक बनाने और अपनी गौरवशाली विरासत को सुरक्षित रखने पर गंभीर मंथन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत सम्राट अशोक के चित्र पर पुष्प अर्पित कर की गई, जिसमें क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर वक्ताओं ने सम्राट अशोक के जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला जिन्होंने भारत को विश्व गुरु की उपाधि दिलाई। सम्राट अशोक फाउंडेशन के केंद्रीय सदस्य दिगंबर मेहता ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए अत्यंत भावुक और ओजस्वी विचार रखे। उन्होंने कहा कि सम्राट अशोक मात्र एक राजा नहीं थे, बल्कि वह एक ऐसी विचारधारा थे जिसने पूरे विश्व को मानवता और करुणा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि हम उस विश्व विजेता शासक के वंशज हैं जिसका साम्राज्य सीमाओं को लांघकर लोगों के दिलों तक फैला था। हालांकि, उन्होंने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए सचेत किया कि आज के दौर में कुछ शक्तियां छल-कपट के माध्यम से हमारे पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को धूमिल करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने समाज से अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपने वास्तविक इतिहास को पहचानने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में युवा नेतृत्व की ऊर्जा भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। युवा नेता गौतम कुमार ने सम्राट अशोक के शासनकाल की तुलना वर्तमान वैश्विक व्यवस्था से की। उन्होंने बताया कि जिस समय भारत शिक्षा, संस्कृति और सामरिक शक्ति में विश्व का नेतृत्व कर रहा था, उस स्वर्ण युग के प्रणेता सम्राट अशोक ही थे। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन की घटना का जिक्र करते हुए गौतम कुमार ने कहा कि एक महान योद्धा वही होता है जो विजय के शिखर पर होने के बावजूद हिंसा का त्याग कर अहिंसा और बुद्ध की शरण में जाने का साहस दिखाए। आज चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार और कंबोडिया जैसे देशों में जो बौद्ध धम्म और शांति की गूंज सुनाई देती है, वह सम्राट अशोक के ही प्रयासों का प्रतिफल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौर्य वंश और शाक्य वंश का संबंध अटूट है और कुशवाहा समाज इसी गौरवशाली विरासत का वाहक है। सम्राट अशोक ने ही सबसे पहले पाली लिपि के माध्यम से बुद्ध के शांति संदेशों को शिलाओं और स्तंभों पर अंकित करवाकर जन-जन तक पहुँचाया था।
महिला नेत्री रेणु देवी ने इस विमर्श को परिवार और आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा से जोड़ा। उनका मानना था कि किसी भी समाज की विरासत तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती जब तक कि घर की महिलाएं और बच्चे अपने पूर्वजों के संघर्षों और उनकी उपलब्धियों से परिचित न हों। उन्होंने कहा कि हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को यह बताने की जरूरत है कि हमारा इतिहास दासता का नहीं बल्कि गौरव और शासन का रहा है। जब तक घर-घर में सम्राट अशोक के सिद्धांतों की चर्चा नहीं होगी, तब तक हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह पुनर्स्थापित नहीं कर पाएंगे।
वहीं सुनील कुशवाहा ने समाज को एक नई दिशा देते हुए सुझाव दिया कि अब समय आ गया है जब सम्राट अशोक की जयंती को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न मानकर एक उत्सव और त्यौहार के रूप में मनाया जाए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हम अन्य सामाजिक त्यौहार मनाते हैं, उसी भव्यता के साथ चक्रवर्ती सम्राट अशोक का जन्मोत्सव हर घर में दीप जलाकर मनाया जाना चाहिए। इससे समाज में एकता की भावना प्रबल होगी और हमारी पहचान को कोई मिटा नहीं पाएगा।
कार्यक्रम के दौरान ऐतिहासिक साक्ष्यों और सांस्कृतिक संवर्धन पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर रोष प्रकट किया कि राजनैतिक प्रोपगेंडा के तहत इतिहास की किताबों और विमर्श से महान नायकों के वास्तविक योगदान को कम करने की साजिश रची जा रही है। इचाक की इस धरती से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि कुशवाहा समाज और सम्राट अशोक के अनुयायी अब जागरूक हो चुके हैं और वे अपनी विरासत के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे।
इस भव्य आयोजन में कुशलचंद मेहता, संगीता देवी, ब्रजकिशोर मेहता, कृष्णा मेहता, राजेश मेहता, अशोक प्रसाद मेहता और अर्जुन मेहता समेत दर्जनों ग्रामीण एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे। सभी ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि भविष्य में सम्राट अशोक की जयंती प्रखंड स्तर पर और भी भव्य और व्यापक रूप से मनाई जाएगी, ताकि आने वाला समय सम्राट अशोक के 'धम्म' और 'न्याय' के शासन को याद रख सके। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और सम्राट अशोक के जयघोष के साथ हुआ, जिससे पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा। यह आयोजन केवल एक जयंती समारोह नहीं था, बल्कि अपनी खोई हुई पहचान को वापस पाने और गौरवशाली अतीत को भविष्य की नींव बनाने का एक शंखनाद था।

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