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EDITOR: NARESH PRASAD SONI
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एयरफोर्स जवान की शहादत के बाद परिजनों के साथ व्यवस्था का क्रूर मजाक, एक प्रमाण पत्र के लिए 15 दिनों तक भटकाया

एयरफोर्स जवान की शहादत के बाद परिजनों के साथ व्यवस्था का क्रूर मजाक, एक प्रमाण पत्र के लिए 15 दिनों तक भटकाया

हजारीबाग: "देश सेवा करने वालों का सम्मान केवल भाषणों में है, धरातल पर नहीं।" यह कड़वी सच्चाई तब सामने आई जब देश की रक्षा करने वाले भारतीय वायु सेना (Airforce) के एक जवान की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके भाई को दाह संस्कार प्रमाण पत्र के लिए हजारीबाग नगर निगम के चक्कर काटने पर मजबूर होना पड़ा। 15 दिनों तक दर-दर भटकने के बाद भी जब सिस्टम नहीं जागा, तब एक समाजसेवी के हस्तक्षेप के बाद देर रात यह प्रमाण पत्र निर्गत हो सका।

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शोक संतप्त परिवार और सिस्टम की संवेदनहीनता

जानकारी के अनुसार, एयरफोर्स में कार्यरत जवान की सड़क दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गई थी। नियमानुसार, मृतक के परिजनों को उनके विभाग में मृत्यु से संबंधित दस्तावेज जमा करने होते हैं। इसके लिए दाह संस्कार प्रमाण पत्र अनिवार्य था। लेकिन नगर निगम के बाबुओं और लचर व्यवस्था ने शोक में डूबे भाई को पंद्रह दिनों तक केवल आश्वासन दिया।

महापौर का वादा भी निकला खोखला

हैरानी की बात यह है कि नगर निगम की बैठकों में महापौर (Mayor) द्वारा अक्सर यह दावा किया जाता रहा है कि प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सेवाएं 24 घंटे के भीतर उपलब्ध करा दी जाएंगी। लेकिन इस मामले ने उन दावों की पोल खोल दी है। पीड़ित भाई ने व्यथा सुनाते हुए कहा कि जिस परिवार ने देश को जवान दिया, उसे अपने ही शहर में मामूली कागज के लिए अपमानित होना पड़ा।

समाजसेवी अभिषेक कुमार ने रात 8 बजे दिलवाया न्याय

जब पीड़ित भाई की कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने समाजसेवी अभिषेक कुमार से संपर्क किया। मामले की गंभीरता और परिवार के दर्द को देखते हुए अभिषेक कुमार तत्काल नगर निगम पहुँचे और अधिकारियों से जवाब तलब किया। उनके कड़े विरोध और हस्तक्षेप के बाद, रात 8 बजे आनन-फानन में दाह संस्कार प्रमाण पत्र जारी किया गया।

जनता का सवाल: कब सुधरेगा सिस्टम?

यह घटना हजारीबाग नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है। यदि एक सेना के जवान के परिवार को न्याय के लिए 15 दिनों तक भटकना पड़ता है और रात के अंधेरे में दबाव बनाकर काम कराना पड़ता है, तो आम जनता की स्थिति क्या होगी?

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