सनातन की शक्ति और अखंड भारत का संकल्प: बनाहप्पा की पावन धरा पर गूंजा शंकराचार्य का एकता मंत्र
हजारीबाग। सदर प्रखंड के हुटपा पंचायत अंतर्गत बनाहप्पा गांव में आयोजित श्री शिव रुद्र महायज्ञ सह प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज का मंगलमय आगमन हुआ। आस्था और उल्लास के अनूठे संगम के बीच ग्रामीणों ने गाजे-बाजे के साथ उनका भव्य अभिनंदन किया। हुटपा चौक से बनाहप्पा स्थित शिवालय तक जगतगुरु के रथ को श्रद्धालु नाचते-गाते हुए गंतव्य तक ले गए, जिससे समूचा क्षेत्र भक्तिमय तरंगों से सराबोर हो उठा।
मुखिया के आवास पर पत्रकारों से संवाद करते हुए शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और राष्ट्र की अखंडता पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इतिहास साक्षी है कि अखंड भारत के जिस भी भूभाग पर सनातनियों की संख्या कम हुई, वह हिस्सा भारत से पृथक हो गया। वर्तमान समय में धर्मांतरण की बढ़ती विभीषिका पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने इसे देश के अस्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती बताया। युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में नैतिकता का समावेश और राष्ट्रभक्ति की चेतना जागृत करना समय की महती आवश्यकता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि हर कस्बे में सनातन धर्म की पाठशालाएं संचालित की जाएं ताकि सनातनी संस्कृति और संस्कारों का बीजारोपण बाल्यकाल से ही संभव हो सके।
शंकराचार्य ने मठ-मंदिरों के प्रबंधन पर भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि देवस्थानों को सरकारी अंकुश से पूर्णतः मुक्त कर देना चाहिए। उनका स्पष्ट मत था कि मंदिरों की आय का उपयोग केवल सनातन धर्म के उत्थान और धर्मावलंबियों के कल्याणार्थ ही होना चाहिए। हालांकि, उन्होंने वर्तमान सरकार के सामरिक और सर्वांगीण विकास कार्यों की सराहना की, किंतु साथ ही समान शिक्षा नीति, समान नागरिक संहिता और समान न्यायपालिका की आवश्यकता पर बल दिया ताकि देश में सामाजिक समरसता बनी रहे और विखंडनकारी शक्तियों पर लगाम लग सके।
बनाहप्पा में आयोजित इस महायज्ञ का समापन शुक्रवार को जगतगुरु के पावन सानिध्य में शिव परिवार की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा और भव्य भंडारे के साथ होगा। इस धार्मिक अनुष्ठान को सफल बनाने में राम जतन सिंह, राजेश सिंह, बसंत वर्मा समेत यज्ञ समिति के समस्त सेवादार अहर्निश जुटे हुए हैं। श्रद्धा का यह सैलाब बता रहा है कि हजारीबाग की इस धरा पर अध्यात्म की गंगा प्रवाहमान है।

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