"जमीन नहीं तो वजूद नहीं!" हज़ारीबाग समाहरणालय के बाहर गरजे जयराम महतो, कड़कती धूप में अधिकारियों को दी खुली चुनौती
बड़कागांव भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हजारों ग्रामीणों के साथ पहुंचे आंदोलनकारी; बोले- '80% जनता की सहमति के बिना एक इंच जमीन भी नहीं देंगे।'
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| Jairam Mahto in Hazaribagh Near DC Office. |
एक वाहन की छत पर खड़े होकर, हाथ में माइक थामे जयराम महतो ने बेहद कड़े लहजे में कहा कि विकास और कोयला खनन के नाम पर झारखंड के मूलवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "अगर हमारे पास जमीन है, तभी हमारा अस्तित्व है, हमारे रिश्ते-नाते हैं। बिना जमीन के हम 'गुलगुलिया' (घुमंतू) और बंजारा बनकर रह जाएंगे।"
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का दिया हवाला
भाषण के दौरान जयराम महतो ने भारत सरकार के 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013' का उल्लेख करते हुए हज़ारीबाग के उपायुक्त (DC) को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि कानूनन किसी भी जनहित या सरकारी कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण करने से पहले 80% स्थानीय विस्थापितों की लिखित सहमति अनिवार्य है। उन्होंने भीड़ से पूछा, "क्या बड़कागांव की 80% जनता इस अधिग्रहण के लिए सहमत है?" जनता ने एक सुर में "नहीं" का नारा लगाया।
अधिकारियों को 3 किमी पैदल चलने की चुनौती
प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए महतो ने कहा कि यदि समाहरणालय के अंदर एसी कमरों में बैठे अधिकारियों (DC, SP आदि) का जमीर जिंदा है, तो वे दोपहर के 12 बजे इस कड़कती धूप में ग्रामीणों के साथ 3 किलोमीटर अलकतरा (डामर) की सड़क पर पैदल चलकर दिखाएं, तब उन्हें ग्रामीणों के दर्द का अहसास होगा। उन्होंने DC से इस पूरे मामले की निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार को भेजने की मांग की, ताकि इस विवादित परियोजना को रद्द किया जा सके।
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीण हाथों में तख्तियां लिए हुए थे, जिन पर कोयला कंपनियों के खिलाफ और अपनी जमीनों को बचाने के नारे लिखे हुए थे। इस आंदोलन के बाद क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।
संपादकीय: विकास की अंधी दौड़ और विस्थापन का दंश
झारखंड में 'जल, जंगल और जमीन' केवल राजनीतिक नारे नहीं हैं, बल्कि यह यहाँ के आदिवासियों और मूलवासियों के अस्तित्व की धड़कन हैं। हज़ारीबाग समाहरणालय के समक्ष जयराम महतो के नेतृत्व में हुआ बड़कागांव के किसानों का प्रदर्शन यह साफ बयां करता है कि कॉरपोरेट विकास की अंधी दौड़ में स्थानीय जनता को विश्वास में नहीं लिया जा रहा है।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 स्पष्ट रूप से जन-सहमति को प्राथमिकता देता है, लेकिन धरातल पर नियम-कानूनों को ताक पर रखकर जबरन विस्थापन की कहानियां अक्सर सामने आती हैं। यदि कोई व्यवस्था अपने नागरिकों को उनके पुरखों की जमीन से उजाड़कर उन्हें अपनी ही धरती पर बंजारा बनने के लिए मजबूर करती है, तो उस विकास के मॉडल पर पुनर्विचार होना लाजमी है। प्रशासन को दमनकारी नीतियों के बजाय बातचीत का रास्ता चुनना चाहिए, क्योंकि बिना जन-सहमति के थोपा गया विकास केवल असंतोष और विद्रोह को जन्म देता है।व्यवस्था को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में 'लोक' (जनता) का स्थान 'तंत्र' (प्रशासन) से हमेशा ऊपर होता है।

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