धर्मांतरण और आरक्षण! क्या ईसाई या मुस्लिम बनने के बाद बरकरार रहेगा SC/ST का दर्जा? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख
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| भारत का संविधान और सुप्रीम कोर्ट की प्रति (सांकेतिक चित्र)। धर्मांतरण के बाद आरक्षण के लाभ पर कानूनी बहस तेज। |
Hazaribagh/ Jharkhand: भारतीय संविधान और न्यायपालिका ने एक बार फिर उस स्पष्ट रेखा को रेखांकित किया है, जो धर्म परिवर्तन और आरक्षण के लाभों के बीच खींची गई है। हालिया कानूनी विमर्श और सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मूल धार्मिक पहचान (हिंदू, सिख या बौद्ध) को त्याग कर ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) के अंतर्गत मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक अधिकारों को खो देता है।
अनुच्छेद 341 और 342 संवैधानिक मर्यादा का सवाल
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 341 स्पष्ट रूप से व्याख्या करता है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन व्यक्तियों को प्राप्त है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं। इसका मुख्य तर्क यह है कि 'अस्पृश्यता' जैसी कुरीति ऐतिहासिक रूप से इन्हीं धर्मों के भीतर दलित समाज ने झेली थी। जब कोई व्यक्ति धर्मांतरण कर ईसाई या मुस्लिम बनता है, तो वह तकनीकी रूप से एक ऐसे वैश्विक समुदाय का हिस्सा बन जाता है जो दावा करता है कि उनके यहाँ कोई जातिवाद या भेदभाव नहीं है। ऐसे में, समानता का दावा करने वाले धर्म में जाने के बाद 'पिछड़ेपन' के आधार पर आरक्षण की मांग करना संवैधानिक रूप से विरोधाभासी माना गया है।
आदिवासी समाज और अनुच्छेद 342 अस्तित्व की रक्षा
अनुसूचित जनजाति (ST) यानी आदिवासी समाज के लिए यह विषय और भी संवेदनशील है। झारखंड जैसे राज्यों में जहाँ मांझी परगना, पाहन, मानकी, मुंडा और पड़हा राजा जैसी पारंपरिक शासन व्यवस्थाएं हैं, वहां जीवनशैली ही पहचान का आधार है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, सरना स्थलों और जाहेरस्थानों में पूजा करने की पद्धति ही एक आदिवासी को परिभाषित करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी हजारों साल पुरानी परंपराओं, पूर्वजों की विरासत और 'देशाउली' की पूजा पद्धति को छोड़ देता है, तो वह सांस्कृतिक रूप से उस समाज का हिस्सा नहीं रहता। ऐसे में अनुच्छेद 342 में सुधार की मांग जोर पकड़ रही है, ताकि धर्मांतरण करने वाले लोग उन लाभों का 'अतिक्रमण' न कर सकें जो केवल मूल रीति-रिवाजों का पालन करने वाले आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं।
क्यों बार-बार उठती है डी-लिस्टिंग की मांग?
धर्मांतरण करवाने वाली संस्थाएं अक्सर लालच, भ्रम या मजबूरी का सहारा लेकर मतांतरण करवाती हैं। विडंबना यह है कि धर्मांतरण के बाद भी कई लोग कागजों पर अपनी पुरानी पहचान छिपाए रखते हैं ताकि उन्हें सरकारी नौकरियों और चुनावों में आरक्षण मिलता रहे। सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों ने इसे 'संविधान के साथ धोखाधड़ी' करार दिया है। यदि एक ही व्यक्ति दो नावों पर सवार रहेगा—अर्थात नए धर्म की सुविधाएं भी लेगा और पुराने समाज का हक भी मारेगा—तो इससे मूल आदिवासी और दलित समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

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