स्थानीय नीति बनाम लैंड बैंक: खतियानी परिवार का वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकार पर बड़ा हमला; कहा— 'झारखंडियों की पहचान, जिसके पास हो खतियान'
अशोक राम की अध्यक्षता और महासचिव मो. हकीम के नेतृत्व में हुई साप्ताहिक बैठक; मूलवासियों-आदिवासियों को नौकरियों में हक देने की मांग
विशेष संवाददाता, रांची/हजारीबाग
झारखंड राज्य गठन के लगभग 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रदेश में 'स्थानीय नीति' (Local Policy) को स्पष्ट रूप से परिभाषित न किए जाने को लेकर मूलवासियों और आंदोलनकारियों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इसी सिलसिले में पुराना धरना स्थल के समीप अशोक राम की अध्यक्षता में 'खतियानी परिवार' की एक महत्वपूर्ण साप्ताहिक बैठक संपन्न हुई। बैठक में स्वर्गीय ए.डी. नन्दी के प्रसिद्ध नारे "झारखंडियों की पहचान / जिसके पास हो खतियान" को दोहराते हुए राज्य के मूल निवासियों के अस्तित्व और अधिकारों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
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| पुराना धरना स्थल के पास स्थानीय नीति को लेकर साप्ताहिक बैठक करते खतियानी परिवार के केंद्रीय महासचिव मोहम्मद हकीम, अध्यक्ष अशोक राम व अन्य। |
बैठक को संबोधित करते हुए खतियानी परिवार के केंद्रीय महासचिव मोहम्मद हकीम ने राज्य की वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकारों की मंशा पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा:
"आज झारखंड प्रदेश को बने करीब ढाई दशक (26 वर्ष) बीत चुके हैं, लेकिन इतनी लंबी अवधि के बाद भी झारखंड सरकार यहां की स्थानीय नीति को स्पष्ट और परिभाषित नहीं कर सकी है। बार-बाहर राज्य के आंदोलनकारी और मूलवासी इस गंभीर समस्या को उठा रहे हैं, लेकिन वर्तमान सरकार सार्थक कदम उठाने के बजाय टालमटोल की राजनीति कर रही है, जिससे स्थानीय नीति का मुद्दा गौन होता जा रहा है।"
महासचिव ने आगे कहा कि सदान और आदिवासी समाज के कल्याण के लिए स्थानीय नीति का अनुसरण करना बेहद आवश्यक है, क्योंकि यहां की गरीब जनता, आदिवासी और हरिजन (दलित) समाज ही इस नीति के न होने से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
रघुवर सरकार के 'लैंड बैंक' पर साधा निशाना
बैठक के दौरान पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर भी निशाना साधा गया। खतियानी परिवार के वक्ताओं ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री माननीय रघुवर दास के कार्यकाल में स्थानीय नीति को परिभाषित करने के बदले 'लैंड बैंक' (Land Bank) बना दिया गया, जिसने झारखंड के स्थानीय लोगों को कंगाल बनाने का काम किया। उन्होंने तर्क दिया कि लैंड बैंक से झारखंड का कल्याण संभव नहीं है, क्योंकि यहां के स्थानीय लोग टाटा-बिड़ला की तरह भौतिक संपदा से संपन्न नहीं हैं जो लैंड बैंक का व्यावसायिक उपयोग कर सकें।
नौकरियों में हक के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की मांग
बैठक में केंद्र और राज्य के बीच चल रही राजनीतिक रस्साकसी पर भी कटाक्ष किया गया। वक्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार दुराचार की सीमाएं पार कर चुकी है और झारखंड सरकार उसका मुकाबला करने के लिए कदम से कदम मिलाकर जवाब तो दे रही है, लेकिन अपने मूल वादे (स्थानीय नीति) को भूल चुकी है। अगर स्थानीय नीति पूरी तरह स्पष्ट हो जाए, तो झारखंड प्रदेश के सदान और आदिवासियों को स्थानीय नौकरियों (State Jobs) में प्राथमिकता मिलती और युवा अपने अधिकारों से वंचित न होते। खतियानी परिवार ने मुख्यमंत्री से दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए अविलंब खतियान आधारित स्थानीय नीति लागू करने का अनुरोध किया है।
बैठक में ये मुख्य लोग रहे उपस्थित
इस साप्ताहिक बैठक में मुख्य रूप से महेश विश्वकर्मा, मोहम्मद आशिक, रामचंद्र राम (मुखिया), मोहम्मद फखरुद्दीन, बोधी सॉव, शंकर राम, कुंती देवी, राधा देवी, प्रदीप कुमार मेहता, सुरेश महतो, मेघ मेहता, तनवीर अहमद, शोएब अंसारी, मोहम्मद मोबीन सहित बड़ी संख्या में खतियानी परिवार के सदस्य और स्थानीय लोग उपस्थित थे।
झारखंड का राजनीतिक परिदृश्य (News Prahari Context Note)
📌 न्यूज प्रहरी विशेष नोट: क्यों उलझा है झारखंड में स्थानीयता का मामला?
झारखंड की राजनीति में 1932 के खतियान या अंतिम सर्वे सेटलमेंट को स्थानीयता का आधार बनाने की मांग हमेशा से संवेदनशील रही है। वर्तमान हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार ने 'झारखंड स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा और परिणामी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य लाभों को ऐसे व्यक्तियों तक विस्तारित करने के लिए विधेयक' पारित कर इसे नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र को भेजा था। हालांकि, कानूनी अड़चनों और राजभवन व न्यायालय के विभिन्न आदेशों के कारण यह मामला अब तक पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाया है, जिससे स्थानीय युवाओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
संपादकीय विश्लेषण: स्थानीय नीति का चक्रव्यूह और युवाओं का भविष्य (Editorial)
सिर्फ नारों और विधेयकों से अलग, एक सर्वमान्य और कानूनी रूप से ठोस नीति की दरकार
खतियानी परिवार की बैठक में उठाए गए सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि झारखंड के लाखों बेरोजगार युवाओं के भविष्य से जुड़े गहरे जज्बात हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि बिहार से अलग होने के 26 साल बाद भी झारखंड यह तय नहीं कर पाया है कि तकनीकी और कानूनी रूप से 'झारखंडी' कौन है? इस नीति के अभाव का सीधा असर जेएसएससी (JSSC) और जेपीएससी (JPSC) जैसी नियुक्तियों पर पड़ता है, जहां अक्सर बाहरी बनाम स्थानीय का विवाद खड़ा हो जाता है और नियुक्तियां अदालतों में लटक जाती हैं।
रघुवर दास सरकार के समय की 'लैंड बैंक' नीति की आलोचना इस मायने में व्यावहारिक है कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े इस राज्य में जमीनों का अधिग्रहण उद्योगों के नाम पर तो हुआ, लेकिन उसका सीधा लाभ स्थानीय रैयतों या आदिवासियों को नहीं मिला। वहीं दूसरी तरफ, वर्तमान सरकार द्वारा भी बार-बार अध्यादेश लाने या विधानसभा से बिल पास कराने के बावजूद उसे कानूनी अमलीजामा न पहना पाना प्रशासनिक शिथिलता या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को ही उजागर करता है। सरकार को चाहिए कि वह केवल चुनावी लाभ के लिए इस मुद्दे को जिंदा रखने के बजाय, एक ऐसी सर्वमान्य, व्यावहारिक और कानूनी रूप से अचूक स्थानीय नीति तैयार करे जो कोर्ट के पैमाने पर भी खरी उतरे, ताकि यहां के मूलवासी-आदिवासी युवाओं को उनका वास्तविक हक मिल सके।
- रिपोर्टर: नरेश सोनी (Editor-in-Chief, News Prahari)
- समाचार स्रोत (Source): खतियानी परिवार, केंद्रीय कमेटी (प्रेस विज्ञप्ति — 30 मई 2026)

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