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EDITOR: NARESH PRASAD SONI
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हजारीबाग कुसुम्बा कांड: पुलिस की थ्योरी या 'साहित्यिक रचना'? DGP की प्रेस विज्ञप्ति पर उठे 10 तीखे सवाल

हजारीबाग कुसुम्बा कांड: पुलिस की थ्योरी या 'साहित्यिक रचना'? DGP की प्रेस विज्ञप्ति पर उठे 10 तीखे सवाल

क्या मासूम की रूह को इंसाफ मिलेगा? FIR के सूचक को ही अभियुक्त बनाने से लेकर 'प्री-मैच्योर बलि' के दावों तक, झारखंड पुलिस की कार्यशैली पर खड़े हुए गंभीर सवाल।

हजारीबाग: जिले विष्णुगढ़ स्थित कुसुम्बा में हुई मासूम की नृशंस हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। लेकिन, 1 अप्रैल 2026 की मध्य रात्रि को पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति ने न्याय की उम्मीदों पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। इस विज्ञप्ति को 'साइंटिफिक इन्वेस्टिगेशन' के बजाय एक 'साहित्यिक कहानी' करार दिया जा रहा है।

purva vidhayak amba prasad ranchi me press Conference karte huey 

जांच रिपोर्ट की 5 बड़ी विसंगतियां:

सूचक ही हत्यारिन? पुलिस के अनुसार मृतका की मां रेशमी देवी ही हत्यारिन है और वही FIR की सूचक भी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सूचक ही अभियुक्त बन जाए, तो कोर्ट में केस को साबित करना लगभग असंभव होगा।

पंचांग और समय का फेर: विज्ञप्ति में अष्टमी की रात बलि की बात कही गई है, जबकि पंचांग के अनुसार हत्या की रात (24-25 मार्च) सप्तमी थी। क्या पुलिस ने कहानी बुनते समय तिथियों का मिलान भी नहीं किया?

भीम राम का रहस्य: आरोपी भीम राम का राजनीतिक संबंध और उसकी संलिप्तता की कहानी गले नहीं उतरती। कोई राह चलता व्यक्ति सिर्फ बुलाने पर गला घोंटने और सिर फोड़ने को कैसे तैयार हो सकता है?

SOP और फॉरेंसिक की अनदेखी: घटनास्थल को 9 दिनों तक असुरक्षित छोड़ना, फॉरेंसिक टीम की देरी और बिना DNA रिपोर्ट के बलात्कार की संभावना को नकारना, पॉक्सो (POCSO) इन्वेस्टिगेशन के नियमों की धज्जियां उड़ाने जैसा है।

सुरक्षा या घेराबंदी? मृतका के परिजनों को सुरक्षा के नाम पर पुलिस घेरे में रखना, कहीं सच को मीडिया से छिपाने की कोशिश तो नहीं?

"इस अनुसंधान के जरिए बच्ची की दोबारा हत्या हुई है। यह पुलिसिया थ्योरी ट्रायल में टिक नहीं पाएगी और असली गुनहगार बच निकलेंगे। इसीलिए हम CBI जांच की मांग करते हैं।"

निष्कर्ष

संविधान के तीनों स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—की गरिमा इस केस के सटीक अनुसंधान पर टिकी है। यदि पुलिस की यह 'चंदा मामा' वाली कहानी सच की कसौटी पर फेल होती है, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह न्याय की मशाल जलाए रखे।

नरेश सोनी प्रधान सम्पादक (न्यूज़ प्रहरी)

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