वर्दी के पीछे धड़कता एक संवेदनशील दिल: इंस्पेक्टर सपन कुमार महथा की सेवा गाथा, चंदनकियारी से निकलकर बनाई साहस और इंसानियत की पहचान
नरेश सोनी, प्रधान संपादक
हजारीबाग (न्यूज़ प्रहरी):
पुलिस की वर्दी केवल एक परिधान नहीं, बल्कि यह कड़े अनुशासन, समाज के प्रति कर्तव्य, कानून के प्रति निष्ठा और जनसेवा की नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक होती है। इस व्यवस्था में कुछ ऐसे पुलिस अधिकारी भी होते हैं जिनकी पहचान पद और वर्दी की सीमाओं से कहीं आगे बढ़कर उनके मानवीय व्यवहार, संवेदनशीलता, अदम्य साहस और जनसेवा के कार्यों से बनती है। झारखंड पुलिस के इंस्पेक्टर सपन कुमार महथा ऐसे ही विरले पुलिस पदाधिकारियों में शुमार हैं, जिन्होंने कम्युनिटी पुलिसिंग को व्यावहारिक धरातल पर उतारकर मिसाल कायम की है।
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| Pelawal circle inspector Sapan Kumar Mahtha life story courage and public service profile |
अभावों के बीच मां के त्याग और 100 रुपये की साइकिल से गढ़ी गई नींव
बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड स्थित चंडीपुर गांव के एक सामान्य किसान परिवार में 11 सितंबर 1971 को जन्मे सपन कुमार महथा का बचपन आर्थिक संघर्षों के बीच बीता। पिता खेती-किसानी करते थे और मां साझा में बकरी व बत्तख पालकर उनके अंडे बेचकर परिवार का हाथ बंटाती थीं। प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा चंदनकियारी से पूरी करने के बाद जब उन्हें उच्च शिक्षा के लिए बोकारो स्टील कॉलेज जाना पड़ा, तो साधन का भारी संकट खड़ा हुआ। उस वक्त मां ने अपने परिश्रम से अंडे बेचकर जुटाए गए 100 रुपये से उनके लिए एक सेकंड हैंड साइकिल खरीदी। वही पुरानी साइकिल आगे चलकर इस किसान पुत्र के सपनों की नई उड़ान का जरिया बनी।
पहली पोस्टिंग में सात लाख के इनामी की गिरफ्तारी और अदम्य साहस
वर्ष 1994 बैच में बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू करने वाले सपन कुमार महथा की पहली पोस्टिंग नालंदा जिले में हुई। सेवा के शुरुआती दौर में ही उन्होंने सात लाख रुपये के कुख्यात इनामी फरार अपराधी सूरजभान सिंह को गिरफ्तार कर पुलिस महकमे में अपनी मजबूत धाक जमाई।
इसके बाद उन्होंने नालंदा, दुमका, स्पेशल ब्रांच, धनबाद, लातेहार, रांची और सीआईडी जैसे संवेदनशील विंगों में जिम्मेदारियां निभाईं। झारखंड गठन के उपरांत वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की सुरक्षा विंग में भी तैनात रहे। हजारीबाग जिले में सदर थाना और विष्णुगढ़ थाना प्रभारी के रूप में सेवा देते हुए उन्होंने नवादा में चर्चित बालिका नरबलि कांड का सफल उद्भेदन कराया। वर्तमान में वे पेलावल सर्किल इंस्पेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
नेतरहाट के घने जंगलों में नक्सलियों के साथ हुई एक मुठभेड़ के दौरान जब उनके करीब एक दर्जन साथी जवान घिर गए थे, तब भारी जोखिम और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अकेले आगे बढ़कर मोर्चा संभाला और साथियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित कराई।
कोरोना त्रासदी में बने इंसानियत की मिसाल: 98 दिनों का लंगर और लावारिस शवों का अंतिम संस्कार
राजधानी रांची के बरियातू थाना प्रभारी रहने के दौरान वैश्विक महामारी कोविड-19 के भयावह दौर में उनका मानवीय चेहरा पूरे देश ने देखा:
- निरंतर 98 दिनों तक भोजनालय: लॉकडाउन और खौफ के दौर में थाना परिसर में जरूरतमंदों, बेसहारा लोगों और रिम्स में भर्ती मरीजों के परिजनों के लिए लगातार 98 दिनों तक निःशुल्क भोजन की व्यवस्था संचालित की।
- हजारों शवों को दिया सम्मान: जब संक्रमण के डर से परिजन अपनों के शव लेने से कतरा रहे थे, तब उन्होंने देश-विदेश से आने वाले परिजनों के फोन पर व्यक्तिगत संवेदनशीलता दिखाते हुए अपने खर्च और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से सैकड़ों पार्थिव शरीरों का पूरे विधि-विधान व सम्मान से अंतिम संस्कार कराया।
- कतरास में संकटमोचक: धनबाद के कतरास में एक ही परिवार के छह सदस्यों की असामयिक मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार कराने में मुख्य सहयोगी की भूमिका निभाई।
जन्मभूमि से गहरा सरोकार और अटूट जनविश्वास
सेवाकाल के विभिन्न पड़ावों के बीच वे कभी अपनी माटी से दूर नहीं हुए। चंदनकियारी क्षेत्र में उनका परिवार सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनकी धर्मपत्नी सुषमा देवी बोकारो जिला परिषद की पूर्व अध्यक्ष तथा वर्तमान जिला परिषद सदस्य हैं, वहीं उनकी बहन भी जिला परिषद सदस्य के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। आम नागरिकों के सुख-दुख में सदैव भागीदार रहना और थाने को जनसुनवाई का सच्चा केंद्र बनाना ही उनकी कार्यशैली का मूल आधार रहा है।
(लेखन व संकलन: रंजन चौधरी, सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र)

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