हजारीबाग: 300 बेड का मेडिकल अस्पताल हुआ अंधेरा, अधीक्षक बोले- 'डीजल नहीं मिल रहा'; सांसद मनीष जायसवाल ने लिया आड़े हाथ,दी बड़ी चेतावनी
ऑक्सीजन हादसे के बाद अब बिजली संकट से जूझा अस्पताल; सांसद प्रतिनिधि रंजन चौधरी ने आधी रात को ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर खोला मोर्चा
विशेष संवाददाता, हजारीबाग
हजारीबाग के सबसे बड़े सरकारी स्वास्थ्य केंद्र, शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कुप्रबंधन और संवेदनहीनता का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अभी एसएनसीयू (SNCU) में ऑक्सीजन पाइपलाइन फटने का हादसा शांत भी नहीं हुआ था कि पूरा अस्पताल परिसर अचानक 'ब्लैकआउट' (घने अंधेरे) में डूब गया। करीब 300 बेड वाले इस अति व्यस्त अस्पताल में बिजली गुल होने के बाद जनरेटर न चलने से मरीजों और उनके परिजनों की जिंदगी पूरी तरह दांव पर लग गई। अस्पताल में पसरे इस अंधेरे और चीख-पुकार के बीच जागरूक मरीजों ने इसकी सूचना तत्काल हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र के सांसद मीडिया प्रतिनिधि रंजन चौधरी को दी। सूचना मिलते ही रंजन चौधरी ने आधी रात को मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और इसकी तस्वीरें सीधे सांसद मनीष जायसवाल तक पहुंचाईं।
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| शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल हजारीबाग की तस्वीर, जहां जनरेटर में डीजल न होने के कारण पूरा परिसर घने अंधेरे में डूब गया था। |
सांसद ने अधीक्षक डॉ के.के. सिंह से सीधे फोन पर किया जवाब-तलब
अस्पताल के भीतर फैले घने अंधेरे और तड़पते मरीजों की तस्वीरें जैसे ही सांसद मनीष जायसवाल के पास पहुंचीं, तो उन्होंने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। सांसद ने तुरंत अस्पताल के अधीक्षक (Superintendent) डॉ. के.के. सिंह को सीधे फोन लगाया और इस घोर लापरवाही पर कड़ा जवाब-तलब किया।
फोन पर बातचीत के दौरान अस्पताल अधीक्षक ने एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना दलील देते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि 'बाजार में उन्हें जनरेटर चलाने के लिए डीजल ही नहीं मिल रहा है।'
'अधीक्षक का बयान हजारीबाग का दुर्भाग्य'— सांसद का तीखा हमला
अधीक्षक के इस गैर-जिम्मेदाराना रुख पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सांसद मनीष जायसवाल ने कहा कि अस्पताल का एक सक्षम और सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी अगर यह लाचारी दिखाता है कि उसे इमरजेंसी सेवा के लिए डीजल नहीं मिल रहा, तो इससे बड़ा हजारीबाग का दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता। सांसद ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अधीक्षक का यह वक्तव्य खुद यह साबित करता है कि वे इस जिम्मेदार पद के बिल्कुल काबिल नहीं हैं और प्रबंधन पूरी तरह नाकारा हो चुका है।
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| शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल हजारीबाग की तस्वीर, जहां जनरेटर में डीजल न होने के कारण पूरा परिसर घने अंधेरे में डूब गया था। |
सांसद मनीष जायसवाल ने खुद के स्तर से डीजल उपलब्ध कराने की घोषणा की
अस्पताल में भर्ती सैकड़ों मरीजों की तकलीफ, वेंटिलेटर पर मौजूद मासूमों और सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सांसद मनीष जायसवाल ने अंततः एक बड़ा और मानवीय फैसला लिया। उन्होंने दो टूक लहजे में अस्पताल प्रशासन से कहा:
"अगर मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन को पूरे जिले में कहीं डीजल नहीं मिल रहा है, तो वह खुद अपने व्यक्तिगत स्तर से अस्पताल के जनरेटर के लिए डीजल उपलब्ध कराएंगे। लेकिन हजारीबाग के इस मुख्य अस्पताल को किसी भी हाल में अंधेरे (ब्लैकआउट) में रहने नहीं दिया जाएगा और स्वास्थ्य सेवाएं बाधित नहीं होने दी जाएंगी।"
नियमतः, देश के किसी भी कानून के तहत कोई भी पेट्रोल पंप संचालक अस्पताल जैसी आवश्यक आपातकालीन सेवा (Emergency Services) के लिए डीजल या ईंधन देने से इनकार नहीं कर सकता है और न ही इस पर कोई प्रशासनिक या चुनावी बाध्यता लागू होती है। इसके बावजूद प्रबंधन का यह रवैया उनकी घोर लापरवाही को दर्शाता है।
अस्पताल बिजली बैकअप मार्गदर्शिका (Emergency Power Audit Guidelines)
📌 न्यूज प्रहरी की तकनीकी सलाह: सरकारी अस्पतालों में 'ब्लैकआउट' रोकने के अनिवार्य नियम
- 72 घंटे का फ्यूल स्टॉक रिजर्व: किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आपातकालीन जनरेटरों (DG Sets) के लिए कम से कम 3 दिन (72 घंटे) का डीजल स्टॉक हमेशा एडवांस में स्टोर रूम में रिजर्व होना चाहिए।
- ऑटोमैटिक चेंजओवर स्विच (AMF Panel): मुख्य बिजली कटने के ठीक 30 सेकंड के भीतर अस्पताल के क्रिटिकल वार्ड्स (SNCU, ICU, OT) में ऑटोमैटिक जनरेटर चालू होना अनिवार्य है, ताकि मैनुअल ऑपरेटर का इंतजार न करना पड़े।
- फ्यूल वेंडिंग एग्रीमेंट: अस्पताल प्रशासन का स्थानीय पेट्रोल पंपों के साथ लिखित इमरजेंसी एग्रीमेंट होना चाहिए, जिसके तहत किसी भी वीआईपी या क्रिटिकल सिचुएशन में ईंधन की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की जा सके।
संपादकीय विश्लेषण: लाचारी का बहाना या आपराधिक लापरवाही? (Editorial)
जब रक्षक ही लाचार हो जाएं, तो जनता किसके भरोसे रहे?
शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पहले ऑक्सीजन पाइपलाइन का फटना और उसके तुरंत बाद पूरे अस्पताल का ब्लैकआउट हो जाना यह साबित करता है कि इस संस्थान का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. के.के. सिंह का यह कहना कि 'डीजल नहीं मिल रहा है', एक प्रशासनिक अधिकारी के मुंह से बेहद हास्यास्पद और खतरनाक लगता है। एक सरकारी मेडिकल कॉलेज का प्रमुख अगर ईंधन जैसी बुनियादी चीज के लिए हाथ खड़े कर दे, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही मानी जाएगी।
हजारीबाग के सांसद मनीष जायसवाल और उनके प्रतिनिधि रंजन चौधरी की यह सजगता निश्चित रूप से सराहनीय है कि वे रात के अंधेरे में भी मरीजों की आवाज बन रहे हैं और अपने स्तर से डीजल देने की पेशकश कर रहे हैं। लेकिन यह एक स्थायी समाधान नहीं है। आज सांसद डीजल दे देंगे, कल कोई और मदद कर देगा, पर उस विशाल सरकारी बजट का क्या होता है जो इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के लिए हर साल जारी किया जाता है? आपातकालीन सेवाओं के लिए कानूनन डीजल ब्लॉक नहीं किया जा सकता, फिर अधीक्षक ने लिखित रूप से जिला प्रशासन या उपायुक्त से मदद क्यों नहीं मांगी? इस पूरे मामले की स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा जांच होनी चाहिए। ऐसे अधिकारियों को पद पर रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है जो मरीजों को अंधेरे में छोड़कर चैन की नींद सो रहे हों। हजारीबाग के नागरिकों को स्वास्थ्य के नाम पर खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।
- रिपोर्टर: नरेश सोनी (Editor-in-Chief, News Prahari)
- समाचार स्रोत (Source): प्रत्यक्षदर्शी एवं ग्राउंड जीरो कवरेज (शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल)


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